दाग धुल ही गए होंगे अब तो हादसों के / यूं तेरा लौट आना अब जन्नत-सा
लगने लगा
- एस.एस.पंवार
कहते हैं रात जब गुजर जाती है तो बात भी चली जाती
है। अब तो मगर कई रातें बीत चुकी, कई साल बीत गए, बात पूरी तरह चली गई होगी। लेकिन
जो बातें लिखी गईं, छपी, अखबारों की सुर्खियां बनीं, गली चौराहों पर चर्चाओं का
हिस्सा बनीं, कैमरों में कैद हुईं, देर तलक देखी और परखी गई; वो इतनी आसानी से चली जाए, शायद इतना
आसां नहीं। लेकिन हरियाणा के हजकां सुप्रीमों के कारनामों, मुलाकातों जजबातों से
तो ठीक ऐसा ही जान पड़ता है कि बात पूरी तरह चली गई होगी। दरअसल राहुल और सोनियां
गांधी के मुलाकाती सिलसिले के बाद हरियाणा
के भूतपूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय
चौधरी भजनलाल के बेटे कुलदीप बिश्नोई ने वापस कांग्रेस में आने का जो मन बनाया था,
वो आगे भी बढता दिखा। इतना ही नहीं उन्होनें अपने इस फैसले को लेकर ये भी कहा था
कि कांग्रेस में आना उनके लिए घर वापसी जैसा है। और ये सब ज्यादा देर से नहीं
वीरवार को ही 10 जनपद दिल्ली में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और उपाध्यक्ष
राहुल गांधी की मौजूदगी में उन्होनें पार्टी का दामन थाम लिया।
निश्चित तौर पर ये मान लिया जाएगा कि उनका कांग्रेस
में जाना घर वापसी जैसा है, ‘घर वापसी’ शब्द जो बीजेपी से जुड़कर विवादों में रह चुका
है शायद अब कुलदीप के साथ जुड़कर उनकी वापसी की शर्म को कम कर रहा है, तस्वीर में
ऐसा कौनसा बड़ा चेहरा बच गया होगा जिसके साथ वो नहीं दिख रहे, शायद शुरूआत में खुद
ये शब्द प्रयोग करके ही उन्होनें मीडिया में इस शब्द को फैला दिया होगा नहीं तो ‘आयाराम गयाराम’ जैसे और भी प्रचलित
शब्द उनके परिवार के साथ जुड़े हुए हैं; शायद कुलदीप ने अपने अतीत का अच्छे से मूल्यांकन
कर लिया होगा और बाद इसे ‘घर वापसी’ कहा होगा। इस वापसी के कई तरह के मायने निकाले
जा रहे हैं, एक ओर जहां भावी हरियाणा के गैर जाट सीएम के रूप में ये खुद को देख
रहे हैं तो वहीं हरियाणा जनहित का वजूद पूरी तरह से खत्म हो जाने की ‘वापसी’ भी इसे कहा जा सकता
है।
मुख्यतौर पर यही चर्चाएं आम है कि बीजेपी के
कामकाज को लेकर जनता की विमुखता के साथ-साथ जाट आंदोलन में कांग्रेस के हुड्डा या
उनके सलाहकार की संदिग्ध भूमिका जो मानी जाती है, उसके बाद शायद एक मौके के रूप
में भी बिश्नोई भी खुद को कांग्रेस में जीना चाहते हों। हालांकि सोशल साईट्स पर जो
कांग्रेस को लेकर मुहब्बत उन्होनें बरसाई थी, उसे भी काबिले-तारीफ कहा जाएगा।
क्योंकि आज वो तमाम अखबारी सुर्खियां पुरानी नहीं जिनमें वो कभी कांग्रेस अध्यक्ष
सोनियां गांधी को गाली देते नहीं थकते थे तो कभी राहुल को फ्लोप पीएम के रूप में उनका भविष्य देखते थे। कांग्रेस
के कुछ विरोधियों द्वारा ये भी कहा जा रहा है कि कुलदीप हमेशा से कांग्रेस के ही
थे और आपसी मनमुटाव के चलते ये पार्टी से दूर हुए, जिसके दूर होने के बाद अब ये 9
वर्ष बाद वापस लौट आए हैं।
सीधे तौर पर देखा जाए तो हरियाणा जनहित
कांग्रेस का कोई खास वजूद रह नहीं गया था। लोकसभा में इस पार्टी की कोई सीट नहीं
है, जबकि 90 विधायकों वाली विधानसभा में पार्टी के सिर्फ दो एमएलए हैं।
वहीं बीजेपी के साथ इन्होनें गत लोकसभा में जिन दो सीटों हिसार और सिरसा ( जिसे
इनका क्षेत्र माना जाता है) से जो चुनाव लड़ा, वो दोनों सीटें हार जाना इनके लिए
चिंताजनक था। ऐसे में लोकसभा की शर्मनाक हार के बाद शायद 2014 से ही पार्टी की दशा
सोचने लायक थी। दिल्ली से जुड़े कांग्रेस सूत्रों के अनुसार हरियाणा के अलावा
केंद्र में बैठे कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता पिछले लंबे समय से कुलदीप के साथ
संपर्क साधे हुए थे। साथ ही, संगठन के कई ऐसे नेता भी हैं, जो
कुलदीप का कांग्रेस में आने का विरोध कर रहे हैं। बताते हैं कि बिश्नोई से बातचीत
के बाद सोनिया और राहुल गांधी इस बारे में हरियाणा के कांग्रेस मामलों के प्रभारी
डॉ. शकील अहमद से भी रिपोर्ट ले चुके हैं।
बेशक, प्रदेश कांग्रेस
के अधिकांश वरिष्ठ नेता कुलदीप की कांग्रेस में वापसी पर चुप्पी साधे हुए हैं,
लेकिन
वे इससे पूरी तरह इनकार भी नहीं कर रहे हैं। वहीं मोटे तौर पर विपक्ष के द्वारा ये
भी माना जा रहा है कि हरियाणा की कांग्रेस खेमों में बंटी हुई है और कुलदीप
बिश्नोई के आने से एक खेमें के बढने के सिवा कुछ नहीं होने वाला। निश्चित तौर पर
ये बात जगजाहिर है कि हरियाणा की कांग्रेस में पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह
हुड्डा, कांग्रेस विधायक दल की नेता किरण चौधरी, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष डॉ. अशोक
तंवर, कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला और कैप्टन अजय सिंह यादव को
गुटों में बांटकर अक्सर देखा जाता रहा है। हरियाणा की सत्तारूढ पार्टी के अध्यक्ष
ने तो इस विलय को महज एक खेमें में वृद्धि होना ही बताया है।
अगर देखा जाए तो भूतपूर्व सीएम भजन लाल
के छोटे बेटे कुलदीप अपने पीछे हरियाणा की चौधर का इतिहास लपेटे हुए हैं। एक मजबूत
वर्चस्व इनके परिवार का सन 2005 में ही देख लिया गया था जब विधानसभा चुनाव चौ. भजनलाल
के नेतृत्व में लड़ा गया था और कांग्रेस ने 67 सीटों के साथ पूर्ण बहुमत हासिल
किया था। लेकिन अधिकतर हरियाणावासियों की उम्मीदों के खिलाफ चौ. भजनलाल के बजाय चौ.
भूपेंद्र सिंह हुड्डा को पार्टी विधायक दल का नेता बनाकर राज्य की कमान सौंप दी गई
थी। इसके बाद से भजनलाल कांग्रेस से खफा थे। 2 दिसंबर, 2007 में बड़ी
रैली करके भजनलाल व उनके बेटे कुलदीप बिश्नोई ने कांग्रेस छोड़ने का ऐलान किया और
इसी दिन हजकां ( हरियाणा जनहित कांग्रेस, बीएल) का गठन भी किया। पार्टी गठन के बाद
कुलदीप बिश्नोई 2 बार लोकसभा और 2 बार ही विधानसभा के चुनावों में पार्टी के
उम्मीदवार उतार चुके हैं।
2009 के लोकसभा चुनावों में हिसार
लोकसभा क्षेत्र से भजनलाल ने हजकां टिकट पर जीत हासिल की थी। इसी वर्ष हुए
विधानसभा चुनावों में कुलदीप बिश्नोई सहित हजकां के 6 विधायक चुने गये। हालांकि
बाद में 5 विधायक कांग्रेस में चले गये थे। 2014 का लोकसभा चुनाव कुलदीप ने भाजपा
के साथ गठबंधन करके लड़ा। हजकां ने 2 सीटों पर चुनाव लड़ा और दोनों पर ही उसके
उम्मीदवारों की हार हुई। विधानसभा चुनाव में भाजपा से गठबंधन टूट गया तो हजकां ने
अपने बूते ही चुनाव लड़ा। आदमपुर से कुलदीप बिश्नोई खुद और हांसी से उनकी पत्नी
रेणुका बिश्नोई ही जीत हासिल कर सकीं। इस तरह से धीरे-धीरे इनका पार्टी प्रभाव कम
होता गया और स्थिति आज तक पहुंच गई।
खैर जो भी हुआ, जैसे भी हुआ, घर वापसी
तो हो ही गई, अब देखना होगा कि घर में प्यार-प्रेम भी बना रहता है या मौजूदा
रहनसहन की तरह बनी अलग-अलग कैबिनों की तरह नए मेहमान सदस्य को भी एक और कमरा सौंप
दिया जाएगा। बीजेपी के चाहे छोटे से लेकर बड़े कार्यकर्ताओं तक जो भी बयानबाजियां
आती रही हों;
बोलने की जरूरत शायद वहीं पैदा होती जहां कुछ न कुछ डर पैदा हो रहा हो या किसी न
किसी तरह दूसरा पलड़ा भारी होता नजर आ रहा हो। लोकतंत्र में हालात चाहे कैसे भी
पैदा हो जाएं लेकिन स्थानीय या प्रादेशिक जनता मुख्य गिनी-चुनी पार्टियों को अक्सर
आजमाती रहती है। आगामी विधानसभा के लिए कांग्रेस या इनेलों चाहे कितनी भी मजबूत या
कमजोर रही हो, या है, लेकिन इस वापसी ने सत्तारूढ बीजेपी को फिर से जीत हासिल करने
के लिए एक संघर्ष की स्थिति तो पैदा कर ही दी है।

लोकतंत्र में हालात चाहे कैसे भी पैदा हो जाएं लेकिन स्थानीय या प्रादेशिक जनता मुख्य गिनी-चुनी पार्टियों को अक्सर आजमाती रहती है।
ReplyDeleteबेहद शुक्रगुजार हूं सर, बहुत दिन बाद ब्लॉग पर आया हूं। आपकी उपस्थिति अच्छी लगी। आज एक पुरानी स्मृति साझा की है। उसे भी देख लेने की अनुकंपा करें। सादर।
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