Wednesday, 18 May 2016

‘आयाराम’ या ‘घर वापसी’


दाग धुल ही गए होंगे अब तो हादसों के / यूं तेरा लौट आना अब जन्नत-सा लगने लगा 


                                                            -  एस.एस.पंवार 

कहते हैं रात जब गुजर जाती है तो बात भी चली जाती है। अब तो मगर कई रातें बीत चुकी, कई साल बीत गए, बात पूरी तरह चली गई होगी। लेकिन जो बातें लिखी गईं, छपी, अखबारों की सुर्खियां बनीं, गली चौराहों पर चर्चाओं का हिस्सा बनीं, कैमरों में कैद हुईं, देर तलक देखी और परखी गई; वो इतनी आसानी से चली जाए, शायद इतना आसां नहीं। लेकिन हरियाणा के हजकां सुप्रीमों के कारनामों, मुलाकातों जजबातों से तो ठीक ऐसा ही जान पड़ता है कि बात पूरी तरह चली गई होगी। दरअसल राहुल और सोनियां गांधी के मुलाकाती सिलसिले के बाद हरियाणा  के  भूतपूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय चौधरी भजनलाल के बेटे कुलदीप बिश्नोई ने वापस कांग्रेस में आने का जो मन बनाया था, वो आगे भी बढता दिखा। इतना ही नहीं उन्होनें अपने इस फैसले को लेकर ये भी कहा था कि कांग्रेस में आना उनके लिए घर वापसी जैसा है। और ये सब ज्यादा देर से नहीं वीरवार को ही 10 जनपद दिल्ली में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और उपाध्यक्ष राहुल गांधी की मौजूदगी में उन्होनें पार्टी का दामन थाम लिया।

निश्चित तौर पर ये मान लिया जाएगा कि उनका कांग्रेस में जाना घर वापसी जैसा है, घर वापसी शब्द जो बीजेपी से जुड़कर विवादों में रह चुका है शायद अब कुलदीप के साथ जुड़कर उनकी वापसी की शर्म को कम कर रहा है, तस्वीर में ऐसा कौनसा बड़ा चेहरा बच गया होगा जिसके साथ वो नहीं दिख रहे, शायद शुरूआत में खुद ये शब्द प्रयोग करके ही उन्होनें मीडिया में इस शब्द को फैला दिया होगा नहीं तो आयाराम गयाराम जैसे और भी प्रचलित शब्द उनके परिवार के साथ जुड़े हुए हैं; शायद कुलदीप ने अपने अतीत का अच्छे से मूल्यांकन कर लिया होगा और बाद इसे घर वापसी कहा होगा। इस वापसी के कई तरह के मायने निकाले जा रहे हैं, एक ओर जहां भावी हरियाणा के गैर जाट सीएम के रूप में ये खुद को देख रहे हैं तो वहीं हरियाणा जनहित का वजूद पूरी तरह से खत्म हो जाने की वापसी भी इसे कहा जा सकता है।

मुख्यतौर पर यही चर्चाएं आम है कि बीजेपी के कामकाज को लेकर जनता की विमुखता के साथ-साथ जाट आंदोलन में कांग्रेस के हुड्डा या उनके सलाहकार की संदिग्ध भूमिका जो मानी जाती है, उसके बाद शायद एक मौके के रूप में भी बिश्नोई भी खुद को कांग्रेस में जीना चाहते हों। हालांकि सोशल साईट्स पर जो कांग्रेस को लेकर मुहब्बत उन्होनें बरसाई थी, उसे भी काबिले-तारीफ कहा जाएगा। क्योंकि आज वो तमाम अखबारी सुर्खियां पुरानी नहीं जिनमें वो कभी कांग्रेस अध्यक्ष सोनियां गांधी को गाली देते नहीं थकते थे तो कभी राहुल को फ्लोप  पीएम के रूप में उनका भविष्य देखते थे। कांग्रेस के कुछ विरोधियों द्वारा ये भी कहा जा रहा है कि कुलदीप हमेशा से कांग्रेस के ही थे और आपसी मनमुटाव के चलते ये पार्टी से दूर हुए, जिसके दूर होने के बाद अब ये 9 वर्ष बाद वापस लौट आए हैं।

सीधे तौर पर देखा जाए तो हरियाणा जनहित कांग्रेस का कोई खास वजूद रह नहीं गया था। लोकसभा में इस पार्टी की कोई सीट नहीं है, जबकि‍ 90 विधायकों वाली विधानसभा में पार्टी के सिर्फ दो एमएलए हैं। वहीं बीजेपी के साथ इन्होनें गत लोकसभा में जिन दो सीटों हिसार और सिरसा ( जिसे इनका क्षेत्र माना जाता है) से जो चुनाव लड़ा, वो दोनों सीटें हार जाना इनके लिए चिंताजनक था। ऐसे में लोकसभा की शर्मनाक हार के बाद शायद 2014 से ही पार्टी की दशा सोचने लायक थी। दिल्ली से जुड़े कांग्रेस सूत्रों के अनुसार हरियाणा के अलावा केंद्र में बैठे कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता पिछले लंबे समय से कुलदीप के साथ संपर्क साधे हुए थे। साथ ही, संगठन के कई ऐसे नेता भी हैं, जो कुलदीप का कांग्रेस में आने का विरोध कर रहे हैं। बताते हैं कि बिश्नोई से बातचीत के बाद सोनिया और राहुल गांधी इस बारे में हरियाणा के कांग्रेस मामलों के प्रभारी डॉ. शकील अहमद से भी रिपोर्ट ले चुके हैं।

बेशक, प्रदेश कांग्रेस के अधिकांश वरिष्ठ नेता कुलदीप की कांग्रेस में वापसी पर चुप्पी साधे हुए हैं, लेकिन वे इससे पूरी तरह इनकार भी नहीं कर रहे हैं। वहीं मोटे तौर पर विपक्ष के द्वारा ये भी माना जा रहा है कि हरियाणा की कांग्रेस खेमों में बंटी हुई है और कुलदीप बिश्नोई के आने से एक खेमें के बढने के सिवा कुछ नहीं होने वाला। निश्चित तौर पर ये बात जगजाहिर है कि हरियाणा की कांग्रेस में पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा, कांग्रेस विधायक दल की नेता किरण चौधरी, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष डॉ. अशोक तंवर, कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला और कैप्टन अजय सिंह यादव को गुटों में बांटकर अक्सर देखा जाता रहा है। हरियाणा की सत्तारूढ पार्टी के अध्यक्ष ने तो इस विलय को महज एक खेमें में वृद्धि होना ही बताया है।

अगर देखा जाए तो भूतपूर्व सीएम भजन लाल के छोटे बेटे कुलदीप अपने पीछे हरियाणा की चौधर का इतिहास लपेटे हुए हैं। एक मजबूत वर्चस्व इनके परिवार का सन 2005 में ही देख लिया गया था जब विधानसभा चुनाव चौ. भजनलाल के नेतृत्व में लड़ा गया था और कांग्रेस ने 67 सीटों के साथ पूर्ण बहुमत हासिल किया था। लेकिन अधिकतर हरियाणावासियों की उम्मीदों के खिलाफ चौ. भजनलाल के बजाय चौ. भूपेंद्र सिंह हुड्डा को पार्टी विधायक दल का नेता बनाकर राज्य की कमान सौंप दी गई थी। इसके बाद से भजनलाल कांग्रेस से खफा थे। 2 दिसंबर, 2007 में बड़ी रैली करके भजनलाल व उनके बेटे कुलदीप बिश्नोई ने कांग्रेस छोड़ने का ऐलान किया और इसी दिन हजकां ( हरियाणा जनहित कांग्रेस, बीएल) का गठन भी किया। पार्टी गठन के बाद कुलदीप बिश्नोई 2 बार लोकसभा और 2 बार ही विधानसभा के चुनावों में पार्टी के उम्मीदवार उतार चुके हैं।

2009 के लोकसभा चुनावों में हिसार लोकसभा क्षेत्र से भजनलाल ने हजकां टिकट पर जीत हासिल की थी। इसी वर्ष हुए विधानसभा चुनावों में कुलदीप बिश्नोई सहित हजकां के 6 विधायक चुने गये। हालांकि बाद में 5 विधायक कांग्रेस में चले गये थे। 2014 का लोकसभा चुनाव कुलदीप ने भाजपा के साथ गठबंधन करके लड़ा। हजकां ने 2 सीटों पर चुनाव लड़ा और दोनों पर ही उसके उम्मीदवारों की हार हुई। विधानसभा चुनाव में भाजपा से गठबंधन टूट गया तो हजकां ने अपने बूते ही चुनाव लड़ा। आदमपुर से कुलदीप बिश्नोई खुद और हांसी से उनकी पत्नी रेणुका बिश्नोई ही जीत हासिल कर सकीं। इस तरह से धीरे-धीरे इनका पार्टी प्रभाव कम होता गया और स्थिति आज तक पहुंच गई।

खैर जो भी हुआ, जैसे भी हुआ, घर वापसी तो हो ही गई, अब देखना होगा कि घर में प्यार-प्रेम भी बना रहता है या मौजूदा रहनसहन की तरह बनी अलग-अलग कैबिनों की तरह नए मेहमान सदस्य को भी एक और कमरा सौंप दिया जाएगा। बीजेपी के चाहे छोटे से लेकर बड़े कार्यकर्ताओं तक जो भी बयानबाजियां आती रही हों; बोलने की जरूरत शायद वहीं पैदा होती जहां कुछ न कुछ डर पैदा हो रहा हो या किसी न किसी तरह दूसरा पलड़ा भारी होता नजर आ रहा हो। लोकतंत्र में हालात चाहे कैसे भी पैदा हो जाएं लेकिन स्थानीय या प्रादेशिक जनता मुख्य गिनी-चुनी पार्टियों को अक्सर आजमाती रहती है। आगामी विधानसभा के लिए कांग्रेस या इनेलों चाहे कितनी भी मजबूत या कमजोर रही हो, या है, लेकिन इस वापसी ने सत्तारूढ बीजेपी को फिर से जीत हासिल करने के लिए एक संघर्ष की स्थिति तो पैदा कर ही दी है।  


...ताकि ‘गेम’ बनकर न रह जाए ‘गेम’

शोहरत की बुलंदी पे ताली ना बजा / ख़लिश-सी निगाहों में तलाश कोई सपना...

                                                  ·        एस.एस.पंवार

खेलों से हम स्वस्थ रहने की बात करते हैं, खेलों से हम संस्कृति, तहजीब की बात करते हैं, खेलों से हम आगे बढने की बात करते हैं। खेल हमारे इतिहास और संस्कृति का हिस्सा होते हैं। खेल मान मर्यादा, स्वाभिमान, जोश, उमंग और देश के प्रति भक्तिभावना और समर्पण का पाठ पढाते हैं। अपने बच्चे को खेलता देखकर कौन मां-बाप प्रफुल्लित न होता होगा। कौन मां बाप ऐसा होगा जो न चाहे कि उसके बच्चे विदेशों में खेलकर देश और परिवार का नाम रोशन करें। जब भी विदेश या बड़ी खेल प्रतियोगिताओं से कोई खिलाड़ी तमगा या मेडल जीतकर लौटता है तो हमारे घरों, पड़ोस और गांव में जिन ढोल-नगाड़ों और फूलमालाओं के साथ जो स्वागत होता है वो तो आपने देखा ही होगा, और ये भी देखा होगा उसी भावुकता में हम गर्व से अपनी जीत का सेहरा मां-बाप के सर बांध देते हैं,  और बांध देना लाजिम सी बात है। लेकिन मां-बाप द्वारा दी गई एक छोटी सी आजादी के बाद वास्तव में हम जो परेशानियां, पीड़ाएं, समझौते, मजबूरियां या बेबसी सहते हैं; क्या ठीक उसी वक्त हमने उसका मूल्यांकन या विश्लेषण करके देखा है कभी? शायद नहीं। मगर भारतीय महिला फुटबाल की पूर्व कप्तान बबीता / सोना चौधरी की हाल ही में आई किताब गेम इन गेम खासकर महिला खिलाड़ियों के कैरियर में आने वाली इन्हीं समस्याओं को रेखांकित करती है।


उनकी किताब के मुताबिक उन्होनें महिलाओं के खेल क्षेत्र में आने वाली हर समस्या को उजागर करने का प्रयास किया है, अपनी किताब में उन्होनें 90 फैक्ट और 10 प्रतिशत फिक्शन शामिल किया है। ये किताब उन दुखदायी अनुभवों पर आधारित है जो उन्होनें आसपास के वातावरण में देखा और खुद अपने समय में बहुत करीब से महसूस किया। मैनेजमेंट को लेकर फुटबॉल टीम के कोच और सेक्रेटरी महिला खिलाडियों के शोषण की बात का जिक्र भी उनकी किताब में आता है। उन्होनें कहा कि जिन कमरों में खिला‍ड़ी रुकती थीं उन्ही कमरों में कोच और सेक्रेटरी भी रूकते थे। बहरहाल, सोना चौधरी की इस सच्चाई से पूरा मीडिया जगत तो वाकिफ है ही वहीं चर्चाएं अब आम जन और गली मोहल्लों तक भी पहुंच गई है। विदित हो कि 1976 में हरियाणा के ही रोहतक जिले में जन्मी सोना चौधरी ने 1989 से अपने कैरियर की शुरूआत की थी, इसी बीच 1998 में एशियन गेम्स से ठीक पहले चोटिल होने के बाद सोना चौधरी को खेल का मैदान छोड़ना पड़ा। अपने इस कैरियर में हरियाणा ही नहीं बल्कि उत्तर प्रदेश और भारतीय महिला फुटबाल की टीम की कैप्टन भी रह चुकी सोना फिलहाल लेखन, इमेज मैनेजमेंट एवं जेंडर ट्रैनिंग फील्ड में एक्टिव है, आपको बता दें कि वे अमेरिका से इमेज मैनेजमेंट और सिंगापुर से लीडरशिप डवलपमेंट की भी पढाई कर चुकी हैं।
खैर जीवन परिचय से कहीं गहरा सवाल ये है कि आखिर क्यों महिलाओं को खेल जगत में क्यों शोषण की दहलीज पार करनी पड़ती है। पिछले दिनों पाकिस्तान से आई एक खबर के मुताबिक वहां 5 महिला क्रिकेट खिलाड़ियों ने मुल्‍तान क्रिकेट क्‍लब (MCC) के अधिकारियों पर यौन शोषण का आरोप लगाते हुए कहा था कि क्‍लब के अधिकारी नेशनल टीम में सलेक्‍शन करने के बदले 'सेक्‍शुअल फेवर' मांगते हैं। इतना ही नहीं खबरें और भी कई इस तरह की आती रही हैं, छोटे ग्रामीण स्तर से लेकर राष्ट्रीय और अन्तराष्ट्रीय स्तर तक ये गंदा खेल देखा जाता रहा है। विश्लेषणात्मक तौर पर देखें तो खेल की गंदगी यहीं नहीं ठहर जाती; खिलाड़ियों के लिए मेडिकल सुविधाओं, यात्रा भत्तों, रहने के लिए, रूकने के लिए महफूज स्थानों और उनकी खुराक इत्यादि को लेकर हर तरह की सुविधाओं पर सरकार को जागने की जरूरत है। खिलाड़ियों की अनदेखी का अंदाजा तो खुद इस खबर से ही लगाया जा सकता है कि कभी हरियाणा और भारत की कैप्टन के तौर पर खेलने वाली सोना को आज हरियाणा पूरी तरह से भूला हुआ है, हालांकि कौशल, विकास, खेल और हर क्षेत्र में अपने अनुभव के बाद साहित्य के मोती पिरोने वाली सोना अपनी प्रसिद्धियों को लेकर आज भी हरियाणा की आने वाली पौध के लिए सजग प्रहरी के तौर पर एक अच्छा चेहरा हो सकती हैं। एक बातचीत में उन्होनें बताया की हरियाणा के बच्चों में खेल क्षेत्र को लेकर अच्छी संभावनाएं है बशर्ते कि उन्हे नियमित मार्गदर्शन, माहौल और अच्छी जमीन मिलती रहे।

हरियाणा के कुछ बाह्य सूत्रों की माने तो हिमाचल प्रदेश द्वारा सोना चौधरी को गोद ले लिए जाने की खबरें भी सुगबुगाहटों में हैं। ऐसे में ये सवाल उठता है कि क्या हरियाणा अपनी बेटी को पूरी तरह से भुला देगा? क्या बेटी बचाने और बेटी पढाने की शुरूआत जिस राज्य से होती है वो इतना भुलक्कड़ साबित हो जाएगा कि वो अपनी बेटी के सम्मान देने की बात पर बचता रहे। क्या कौशल विकास की बात करने वाली हरियाणा की सरकार सोना से कोई कुशलता नहीं जानेगी? क्या खिलाड़ियों को सम्मान देने की बात पर भी सरकार की कान पर जूं तक नहीं रेंगेगी?  लिहाजा कई सवाल इसे लेकर खुद ब खुद सिर्फ इसलिए खड़े होते हैं कि सरकारों की कथनी और करनी के समाधान जिन संभावित स्थानों पर होते हैं; सरकारें अक्सर वहां से बचकर निकलने का प्रयास करती है। लेकिन क्या इस संबंध में हमे कचोटने वाले हजारों सवालों को ढक देना उचित है? खेल मंत्रालय हो या सरकारें चाहे पल्ला झाड़ने या कन्नी काटने के लिए किसी तरह के आश्वासन या सुझाव दें लेकिन बात सिर्फ एक खिलाड़ी या एक खेल की नहीं बल्कि पूरी व्यवस्था की है, जिसको साफ करने की जिम्मेदारी मंत्रालय, सरकार और खेल संघों पर ज्यादा है।