Monday, 15 February 2016

कहानियों का अंजुमन

''बूढे के मुख से कोई ऐतिहासिक सच्चाई अंगड़ाई ले रही हो जैसे। मेरे अचेतन में चेतना के पैरों की आहट कुछ तेज हुई, पल-भर में मनोज-बबली जैसे कई किस्से बिजली की तरह मेरी आंखों के आगे से कौंध गए।''


अधुरी कहानी                                                                                                                                                    एस. एस. पंवार                    


वक्त के पैरों ने, न जाने कब अपना रास्ता बदला और जिंदगी के सफर में एक अनजान सख्स को पनाह दे दी।

अनजान तो उसे नहीं कह सकता लेकिन अभी अनजान ही कहूंगा क्योंकि उसे जानते हुए भी नहीं जानता मैं, और जानता बहुत हूं।

. . . . ये उन दिनों की हवा है जब मैं कॉलेज में नया-नया गया ही था गांव से। दिन खामोशी लिए उदय होते, ढल जाते। उन शुरूआती दिनों कॉलेज में आना-जाना काफी सुकूं देता था मुझे। आने जाने के लिए जब भी गाड़ी में बैठता तो अक्सर सोचा करता था के जिंदगी के सफर में ऐसे छोटे-छोटे न जाने कितने सफर होते हैं, और उन सफरों में भी छोटे-छोटे और सफर निकल आतें हैं। आज जब घर के लिए रेलगाङी में बैठकर घर लौट रहा था तो कुछ ऐसा ही सोच रहा था मैं, कि अनायास ही मेरी नजर एक जगह टिक गई।

एक लङकी। कच्चे रेशम-सी। अभी वो बालिग नहीं। लेकिन बालिग ही हो जैसे। सुंदर तो थी ही, लेकिन उस सुंदरता का वर्णन करना शायद ज्यादा पागलपन हो मेरा। वर्णन करना उसकी सुंदरता को कम करना मात्र है। शायद ही कोई कालिदास उसे लिख पाए। उसे सिर्फ महसूस किया जा सकता था। वो मेरे सामने की सीट पर ही थी। जिस दिशा में गाङी चल रही थी उस तरफ पीठ थी मेरी। अत: सामने की हवा उसके बालों को उङा रही थी, जो बार-बार उसके माथे पर गिर रहे थे। उन छोटे बालों का बिना हवा के भी यूं गिरना स्वभाविक था मगर आज लग रहा था जैसे हवा उनसे कोई पुरानी रंजिश निकाल रही हो ।

बचपन में मैं ऐसे सफर के दौरान अक्सर मैं गाङी की खिङकी से बाहर पीछे छूटते वृक्षों और खेतों को देखा करता था लेकिन आज अंदर ही देख रहा था, लेकिन वो लड़की अब भी थोङी- थोङी देर के लिए बाहर वृक्ष देख लेती। उसे यूं देखते देखकर मुझे लगा जैसे मेरे सारे वृक्ष और खेत पीछे छुट गए हों, अब  मैं शायद बाहर देखूंगा तो भी मुझे कोई वृक्ष दिखाई नहीं देगा।

नजरें क्या टिकी..... बस टिकी ही रह गई।

और उन झील सी आंखों में मुझे वो समुन्द्र दिखाई दिया जिसकी कल्पना आजतक इन आंखों से परे थी। आंखों ने अपना काम किया और बाकि फाइलें मस्तिष्क के पास भेज दी और यहां तो आंखों का मस्तिष्क के साथ ऐसा रिश्ता था कि इन नयनों के प्रस्ताव को उसने कभी ठुकराया नहीं।  

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वर्षों ध्यान के लिए बैठने पर भी जो ध्यान न लगा वो आज अनायास ही लग गया। अचानक जैसे आसपास की चीजें खो गई और केवल वही चेहरा दिखाई देता रहा। साधारण से सफर में जाने कैसी घटना थी कि सबकुछ मेरे बिना किए स्वत: ही चलता रहा। शायद रजनीश के शब्दों को आज हकीकती जमीन मिल  गई, ऐसा सोच रहा था मैं उस वक्त ।

उसको देखते ही लगा जैसे वर्षों से जानतें हैं हम एक-दूसरे को। पता नही क्या हो गया था मुझे, एक आनंन्द ने मुझे घेर लिया, जैसे दूर कहीं जंगल में अकेला बैठा हूं मैं, या कोई झरना फूट पड़ा है मेरे आसपास।

इसे क्या नाम दूं ? इस असमंजस में डूबा हुआ था मैं, जैसे किसी बच्चे से कोई नया खिलौना दिखाकर उसका नाम पूछ लिया गया हो।

बाकि लोगों की तरह इसे प्यार कहूं या.............
चलो कह देता हूं मैं भी, क्योंकि ऐसे आनंन्द को इसी शब्द से नवाजा है अब तक दुनियां नें। अमृता की तरह जंगली बूटी तो मैं भी नही खिला सकता।

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अशाब्दिक अभिव्यक्तियां दोनों तरफ सक्रीय थीं। थोड़ी सी देर में काफी कुछ सोच लिया था मैंने उस वक्त, मेरे और उसके बारे में। ठान ली थी कि इसी के साथ जिंदगी गुजार देंगे अब तो.....
स्टेशनों पर बार बार रूकती रेलगाड़ी मेरी धड़कनें तेज कर रही थी। गाड़ी ने एक लम्बा हॉर्न दिया।  शायद अब वो घड़ी आ ही गई थी जिसका मुझे डर था। इस बार के स्टेशन पर गाड़ी रूकने के लिए धीरे हुई और मेरी धड़कने तेज। लड़की ने हवा से कानों और चेहरे पर बिखरे बालों को ठीक किया, जो गाड़ी की धीमी रफ्तार के कारण इस बार दोबारा नहीं बिखरे। वो मेरी तरफ देखती हुई, आंखों में कुछ नमीं सी लिए धीरे सी खड़ी हुई, अपना थैला उठाया और उतरने के लिए एक औरत के पीछे-पीछे चल दी । मैं भी उसमें डूबा-हुआ-सा खड़ा हो गया। कुछ कदम बढाए मैंने उसके पीछे...

 ......लेकिन जिस बारी से मैं उतरने ही वाला था, उसी बारी से चढते हुए मुझे पापा दिखाई दिए। पापा को देखकर मेरे कदम रूक से गए। पापा ने मुझे देख लिया और मैं एकदम अनदेखा भाव बनाकर गले और कान के पास खुजली करते हुए चेहरे पर वास्तविक खुजली के भाव बनाकर गर्दन दूसरी तरफ मोड़ते हुए पास की ही खाली सीट पर बैठ गया।

. . . . . वो भी शायद न उतरती, गर उसकी मजबूरी न होती। आखिर उसकी मजबूरी ने उतार दिया उसे और मेरी मजबूरी ने मुझे बैठाए रखा।

 और मुझे ही नहीं इस समाज में अनेकों युवाओं को ऐसी मजबूरियां वर्षों बैठाए रखती हैं।

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  . . . बस एक मिलन ही था शायद..... और फिर वक्त ने अपना इतिहास दोहराया और मिलन की लम्बी घड़ियां परोस दी  मुझे।

ताउम्र उसका साथ निभाने की सोचकर मैं वर्षों इंतजार करता रहा कि वो राही मुझे फिर मिलेगा मगर वक्त के लम्बे हाथों का अंदाजा मैं ना लगा पाया। इस इन्तजार में मेरे दिल नें प्यार की इन्हीं पंक्तियों को समर्थंन दिया . . . .. .

                     प्यार वो नहीं जिसमें जीत और हार हो
                     प्यार कोई चीज नही जो हर वक्त तैयार हो
                     प्यार तो वो है जिसमें किसी के आने की उम्मीद न हो
                     लेकिन फिर भी इंतजार हो . . . . . .

. . . . . . . बस ये इंतजार बना रहा। मैं जहां भी जाता, एक साये की तरह वो चेहरा मेरे साथ चलता। हर राह, मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारों और मैलों की भीड़ में ये आंखे उसे तलाशती, मगर किसी भी रास्ते पर उस दिन की तरह आंखे चार नहीं हुई।

दिनों, महिनों और सालों को वक्त के धागे में मनकों की तरह पिरोता गया मैं, मगर धागे की लंबाई की सीमा का अंदाजा न था मुझे।
कल्पना के चांद की तरह वो चेहरा वर्षों मेरे साथ चला।

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आज देर रात उसी की याद में कलम घिस रहा था। अचानक आंख लग गई। और एक विचित्र स्वपन ने मुझे घेर लिया। जिसमें मैं उसे खोजता हुआ दर दर भटक रहा था और उसे आवाज दे रहा था। अंत में मैंने देखा कि मैं पहाड़ों पर उसे खोजने निकल पड़ा हूं और उसकी बाईं बाजू पर लिखा वो नाम पुकार रहा हूं जो मिलन के वक्त मैंने देखा था। लेकिन मुझे लग रहा था जैसे कि मेरी आवाज उन बेजान पत्थरों से टकराती हुई वापस मुझे ही सुनाई पड़ रही है।

अंत में मैने एक भयंकर दृश्य देखा कि एक भयानक आकृति का सफेद मूंछ-दाढी वाला बूढा  विरान पत्थर की गुफा में बैठा घूर रहा है, उसके हाथ बिलकुल जर्जर थे। ये दृश्य वर्षों पुराना प्रतीत हुआ मुझे।

मैंने उसको प्रणाम किया लेकिन वो वृद्ध केवल भर मुझे घूरता रहा। मैं सहम गया। उस सुनसान वातावरण और उसकी डरावनी शक्ल ने मेरे शरीर में एक कंपन पैदा कर दी। मेरी घबराहट कुछ और बढ गई।

अचानक भागने के लिए मैं पीछे मुड़ा। मैंने देखा कि एक अत्यंत गहरी झील मेरे पांवों के करीब बन गई है।

मैं खड़ा रहा रहा और धक्के से लम्बे-लम्बे सांस लेकर हिम्मत बांधने का प्रयास करने लगा।

अचानक उसके होंठ कंपकंपाते स्वर में हिले, प्रेमिका की तलाश में निकले हो बेटा ?”

म..म..मगर तुम्हे कैसे पता? ” मेरे मुंह से डर और लड़खड़ाहट के साथ निकला।

वो मिल भी गई तो क्या कर लोगे तुम ?”

बस एक बार मिल जाए मुझे।

एक बार मिली थी न, उसी के कारण तुम्हारा ये हाल है।

लेकिन...............

वो तुम्हारी जाति-बिरादरी से नही है बेटा।

मैं अवाक रह गया सोचने लगा एकदम प्रेम के साथ ये नया क्या जुड़ गया, जो उस मिलन के लम्बें समय से लेकर पल-भर पहले तक मेरे चिंतन से बाहर था। मुझे लगा जैसे क ख ग पढने वाले बच्चे से एकदम किसी ने कोई क्लिष्ठ-सा बड़ा नाम पूछ लिया हो।

कुछ देर सन्नाटा पसरा रहा।

फिर बूढा बोल पड़ा- बेटा, तुमसे पहले तुम्हारे जैसे इसी तरह का रिश्ता लिए बहुत आए हैं यहां। लेकिन तुम्हारे समाज के सोए हुए लोगों ने उन्हे जीने नहीं दिया बूढे के मुख से कोई ऐतिहासिक
सच्चाई अंगड़ाई ले रही हो जैसे। मेरे अचेतन में चेतना ने के पैरों की आहट कुछ तेज हुई, पल-भर में मनोज-बबली जैसे कई किस्से बिजली की तरह मेरी आंखों के आगे से कौंध गए।

लेकिन इन सबको एक नाटक समझकर मेरे मुख से निकला......... फिर भी?”

फिर ये पीढीयों पुरानी जात-पात की दिवारें तुम्हें भी जीने नहीं देंगी बेटा। पहले तुम सभी प्रेमी लोग संगठित होकर इन्हे दूर करो। और ऐसा कहते हुए बूढे ने जैसे ही चारों तरफ हाथ फैलाया, एक विशाल दीवार ने उन पहाड़ों के चारों तरफ आकार ले लिया, शायद चीन की दीवार से भी बड़ी।

मैंने डरते हुए तुरंत उस बुड्ढे की तरफ देखा और पूछा कि, तुम्हे कैसे मालूम, तुम कौन्.......... और जैसे मेरा ये लफ्ज अधुरा ही छुट गया हो....

उसने कहा, मैं समय हूं।

इतने में मुझे जैसे कोई करंट का झटका-सा लगा। मैं चमका और मेरी आंखे खुल गई। आज भी उस स्वपन को सोच रहा हूं..............

कभी कभी मुझे ये कोरी कल्पना भर जान पड़ती है, मगर एकांत  के दौरान जब अंदर झांक कर देखता हूं तो वो दिन आज भी हरे हो जाते हैं। अब लगता है शायद यह कोई कहानी नहीं...

वरन
मेरे जीवन के पौधे पर लगा
एक अधखिला पुष्प है।
जिसे
समय रहते
न तो समाज ने खिलने दिया
और न ही
पर्यावरण ने इसे पोषण दिया।
और ये ऐसा पुष्प
कालान्तर में
शब्दों का सहारा पाकर

एक अधुरी कहानी बन गया।

                   - साल 2014 में हरियाणा ग्रंथ अकादमी की मासिक पत्रिका कथा-समय के मार्च अंक में प्रकाशित
                                                  


Sunday, 14 February 2016

छुटे प्रेमों का गलियारा...

स्मृति


माजरा से लौटे अभी सप्ताह-भऱ बीता है।

उन्नीस सेक्टर में ऐसा कुछ भी नहीं जो माजरा की गलियों था।

यहां की मिट्टी में उस नगर-सी खुशबू नहीं। यहां की गलियों में वो चौबारे भी नहीं। और न ही इस वातावरण में वहां-सी नमीं...

पहाङियों से कुछ ही दूरी पर बसा वह टाऊन लगभग हर रोज बारिश से भीग जाता था। चौथी मंजिल यानि कमरे की छत से जब मैं उत्तर की ओर जब भी देखता; कोहरे की चादर से लिपटी पहाड़ियां मेरे दिल सुकूं से भर देती थी।

वो मिले-जुले लोग। गुरुद्वारा मंदिर.... और वो मस्जिद भी अब जैसे पुराने शहर की-सी यादें हो चुकी हैं। मगर कभी-कभी ये लगता नहीं कि मैं उस बस्ती को छोङ आया हूं । यूं महसूस होता है जैसे दो जगहों की जिंदगी जी रहा हूं मैं।

यहां की गलियों में भी वहां की तरह काफी बच्चे गुजरतें हैं सुबह-सुबह। मगर वो दलित परिवारों से नहीं। कुछ...हाथों में किताब लिए, तो  कुछ पीठ पर बङा-सा थैला लटकाए बच्चे। जो शायद स्कूल जा रहे होतें हैं। उनमें कुछ कालू, कुछ राजू और कुछ गुलाल लगते हैं मुझे , जो माजरा की मंदिर वाली गली के पास की झुग्गीयों से निकलते थे ठीक इसी वक्त। 

यहां की हर बूढी औरत में अब वो दादी नजर आती है जो सुबह-सुबह शहर के उठने से पहले उठकर पास के मंदिर चली आती थी।

जाने क्यों मैंने वो टाऊन छोङ दिया जिसकी स्मृतियां अब भी मेरे जेहन में सांसो की तरह ताजा है। यहां की साफ गलियों को देखकर भी लगता है जैसे अभी-अभी कोई गाय लिफाफा खा गई.... अभी एक कुत्तों का झुंड यहां से निकल गया। एक भिखारी ने आज फिर मेेरे सामने हाथ फैलाया.... 

और शाम को पांच बजे हर रोज की तरह जैसे वो फटे कपङों वाली औरत कमर पर एक कट्टा-सा लटकाए मेरे माजरा वाले दरवाजे पर थोङा-सा रुक-कर फिर आगे बढी होगी... 

सामने वाली पिंकी आज भी कुछ टूटी हुई-सी तमन्नाएं लेकर जब छत पर आई होगी तो उसे सामने की बालकनी में कोई नहीं दिखा होगा। इसी तरह रोज सामने का सूना चौबारा देखकर बेचारी रो देती होगी वो...

बचपन में मां के चले जाने के बाद अब उसकी इस उम्र के असमंजस भरे हालात कौन समझता होगा। पापा अब भी उसे बात-बात पर डांटते-फटकारते होंगे। और पास के घर वाली शालू अब भी स्कूल जाते वक्त पापा से पैसे मांगती होगी...

.....और रक्षाबंधन के पहले दिन पकौङे वाले हामिद के खोखे के पास जिस कुतिया ने तीन बच्चों को जन्म दिया था, वो शायद अब सङक के किनारे तक आने लग गए होंगे।

....आज सुबह जब मैं उठा, तो लगा कि उस बैंक के पास लगते ढाबे वाले बिहारी रामू पासमान ने जो मेरे लिए चाय बनाई थी अभी-अभी , वो काफी ठंडी हो गई .........

                                                                                                 
                                                                                                                      एस. एस. पंवार

                                                                                                                  डायरी के पन्नों से  

                                                               8 सितंबर, 2013, पंचकूला

                                                                                                     

तुम्हारे प्रेमपत्रों से...

प्रिय............


कई दफे तुम्हारे शहर से गुजरना होता है। उजालों, अंधेरों, पो-फटते या साँझ के वक्त। वक्त की जाने वो कौन सी घड़ी होती है, जब ट्रेन तुम्हारे शहर से गुजरती है। तुम्हारे अपने शहर से। मगर जब भी यहां हवाओं से मेरा सामना होता है या ट्रेन ठहरती है यहां, तो सहम-सा जाता हूँसिहर जाता हूँ बेचारी सी आँखें स्टेशन की बेजान कुर्सियां देख रो पड़ती हैं। सोचता हूँ ट्रेन के साथ मैं भी रुक जाऊं, और कुछ पल फिर से बैठ जाऊं उन खाली जगहों की बेरंग यादों में, जहां की सोहबत नें मेरे खाली पन्नों में अपना पहला सफ़ा छोड़ा था। कई दफा तो मन करता है रोऊं यहां बैठकर... जार-जार...

बरसात, पीपल, सूखे पत्ते, झड़े हुए पत्ते, तुम्हारे आंसू और हवा की हल्की-सी गांठें आज भी मेरे भीतर एक भूचाल ला देती है।  मुझे याद है कि एक शाम मैंने तुम्हारे स्टेशन से पीपल के पत्ते तोड़ लिए थे। दो पत्ते। उन पत्तों के सिवाय मेरे पास कुछ भी नहीं है तुम्हारा, भौतिक रूप से। ये पत्ते स्मृतियां हैं तुम्हारी। जीवंत लोगों की मृत स्मृतियां...


कई दफा ये तोहफों-से लगने लगते हैं मुझे। सोचता हूं सामने की अलमारी में सजा दूं... और हटा दूं वहां सालों से रखे धातुओं के स्मृति चिह्न, मेडल्स और ट्रॉफियां। फिर सोचता हूं कहीं सफाई के ये बाहर न फेंक दिए जाएं। बस इस ख़याल के बाद इन्हें साथ रखने लगा हूं, जब भी तुम्हारी याद आती है, इन्हें निकाल लेता हूं। देख लेता हूं। पढ लेता हूं इन पर लिखे तुम्हारे शहर की आबोहवा के खूबसूरत हस्ताक्षर।


बड़ा शरमाया था इन्हें तौड़ते वक्त। रात के अंधेरे में तोड़े पीपल के अंग हैं ये। सोए पेड़ के पत्ते तोड़ना यूं तो अच्छा नहीं होता, धर्म और विज्ञान के फलसफ़े भी इजाजत नहीं देते इसके लिए। मगर यादों की सूईयां जब चुभती है तो तुम्हारे शहर की मिट्टी भी देख लेने को जी चाहता है। शायद यही सोचकर अंजाम दिया था मैनें इस कृत्य को...

जब से तुम गई हो। सब बदल-सा गया है। मुहब्बत की बात करना अब मेरे लिए खुद से युद्ध करने-सा है, मगर जानती हो ! लड़ने की ताकत भी प्रेम में ही होती है। प्रेमों के बगैर जिंदगी तबाह है शायद। प्रेम हौसला है जीवन के लिए, प्रेम प्रोत्साहन है। मैं आनंद से जी लेने को प्रेम कहता हूं। तुम्हारा लौट आना शायद ताकत दे सकता है। खिज़ाओं की बदहाली में बागानों की लकड़ियां तक निलाम हो सकती है। जरा सी मुहब्बत बची है, तो लौट आना।  

                                                     
                                                           पत्र के इंतजार में...

                                             तुम्हारा अपना 'चीनी जापानी'