शोहरत की बुलंदी पे ताली ना बजा / ख़लिश-सी निगाहों में तलाश
कोई सपना...
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एस.एस.पंवार
खेलों से हम स्वस्थ रहने की बात करते हैं, खेलों
से हम संस्कृति, तहजीब की बात करते हैं, खेलों से हम आगे बढने की बात करते हैं।
खेल हमारे इतिहास और संस्कृति का हिस्सा होते हैं। खेल मान मर्यादा, स्वाभिमान,
जोश, उमंग और देश के प्रति भक्तिभावना और समर्पण का पाठ पढाते हैं। अपने बच्चे को
खेलता देखकर कौन मां-बाप प्रफुल्लित न होता होगा। कौन मां बाप ऐसा होगा जो न चाहे
कि उसके बच्चे विदेशों में खेलकर देश और परिवार का नाम रोशन करें। जब भी विदेश या
बड़ी खेल प्रतियोगिताओं से कोई खिलाड़ी तमगा या मेडल जीतकर लौटता है तो हमारे
घरों, पड़ोस और गांव में जिन ढोल-नगाड़ों और फूलमालाओं के साथ जो स्वागत होता है
वो तो आपने देखा ही होगा, और ये भी देखा होगा उसी भावुकता में हम गर्व से अपनी जीत
का सेहरा मां-बाप के सर बांध देते हैं, और
बांध देना लाजिम सी बात है। लेकिन मां-बाप द्वारा दी गई एक छोटी सी आजादी के बाद
वास्तव में हम जो परेशानियां, पीड़ाएं, समझौते, मजबूरियां या बेबसी सहते हैं; क्या ठीक उसी वक्त
हमने उसका मूल्यांकन या विश्लेषण करके देखा है कभी? शायद नहीं। मगर भारतीय महिला फुटबाल की
पूर्व कप्तान बबीता / सोना चौधरी की हाल ही में आई किताब ‘गेम इन गेम’ खासकर महिला
खिलाड़ियों के कैरियर में आने वाली इन्हीं समस्याओं को रेखांकित करती है।
उनकी किताब के मुताबिक उन्होनें
महिलाओं के खेल क्षेत्र में आने वाली हर समस्या को उजागर करने का प्रयास किया है,
अपनी किताब में उन्होनें 90 फैक्ट और 10
प्रतिशत फिक्शन शामिल किया है। ये किताब उन दुखदायी अनुभवों पर आधारित है जो
उन्होनें आसपास के वातावरण में देखा और खुद अपने समय में बहुत करीब से महसूस किया।
मैनेजमेंट को लेकर फुटबॉल टीम के कोच और सेक्रेटरी महिला खिलाडियों के शोषण की बात
का जिक्र भी उनकी किताब में आता है। उन्होनें कहा कि जिन कमरों में खिलाड़ी रुकती
थीं उन्ही कमरों में कोच और सेक्रेटरी भी रूकते थे। बहरहाल, सोना चौधरी की इस
सच्चाई से पूरा मीडिया जगत तो वाकिफ है ही वहीं चर्चाएं अब आम जन और गली मोहल्लों
तक भी पहुंच गई है। विदित हो कि 1976 में हरियाणा के ही रोहतक जिले में जन्मी सोना
चौधरी ने 1989 से अपने कैरियर
की शुरूआत की थी, इसी बीच 1998 में एशियन गेम्स से ठीक पहले चोटिल होने के बाद
सोना चौधरी को खेल का मैदान छोड़ना पड़ा। अपने इस कैरियर में हरियाणा ही नहीं
बल्कि उत्तर प्रदेश और भारतीय महिला फुटबाल की टीम की कैप्टन भी रह चुकी सोना
फिलहाल लेखन, इमेज मैनेजमेंट एवं जेंडर ट्रैनिंग फील्ड में एक्टिव है, आपको बता
दें कि वे अमेरिका से इमेज मैनेजमेंट और सिंगापुर से लीडरशिप डवलपमेंट की भी पढाई
कर चुकी हैं।
खैर जीवन परिचय से कहीं गहरा सवाल ये
है कि आखिर क्यों महिलाओं को खेल जगत में क्यों शोषण की दहलीज पार करनी पड़ती है। पिछले
दिनों पाकिस्तान से आई एक खबर के मुताबिक वहां 5 महिला क्रिकेट खिलाड़ियों ने मुल्तान
क्रिकेट क्लब (MCC) के अधिकारियों
पर यौन शोषण का आरोप लगाते हुए कहा था कि क्लब के अधिकारी नेशनल टीम में सलेक्शन
करने के बदले 'सेक्शुअल फेवर' मांगते हैं। इतना ही नहीं खबरें और भी कई इस तरह की आती रही हैं,
छोटे ग्रामीण स्तर से लेकर राष्ट्रीय और अन्तराष्ट्रीय स्तर तक ये गंदा खेल देखा
जाता रहा है। विश्लेषणात्मक तौर पर देखें तो खेल की गंदगी यहीं नहीं ठहर जाती; खिलाड़ियों के लिए मेडिकल सुविधाओं, यात्रा भत्तों, रहने के लिए,
रूकने के लिए महफूज स्थानों और उनकी खुराक इत्यादि को लेकर हर तरह की सुविधाओं पर
सरकार को जागने की जरूरत है। खिलाड़ियों की अनदेखी का अंदाजा तो खुद इस खबर से ही
लगाया जा सकता है कि कभी हरियाणा और भारत की कैप्टन के तौर पर खेलने वाली सोना को
आज हरियाणा पूरी तरह से भूला हुआ है, हालांकि कौशल, विकास, खेल और हर क्षेत्र में
अपने अनुभव के बाद साहित्य के मोती पिरोने वाली सोना अपनी प्रसिद्धियों को लेकर आज
भी हरियाणा की आने वाली पौध के लिए सजग प्रहरी के तौर पर एक अच्छा चेहरा हो सकती
हैं। एक बातचीत में उन्होनें बताया की हरियाणा के बच्चों में खेल क्षेत्र को लेकर
अच्छी संभावनाएं है बशर्ते कि उन्हे नियमित मार्गदर्शन, माहौल और अच्छी जमीन मिलती
रहे।
हरियाणा के कुछ बाह्य सूत्रों की माने
तो हिमाचल प्रदेश द्वारा सोना चौधरी को गोद ले लिए जाने की खबरें भी सुगबुगाहटों
में हैं। ऐसे में ये सवाल उठता है कि क्या हरियाणा अपनी बेटी को पूरी तरह से भुला
देगा? क्या ‘बेटी
बचाने और बेटी पढाने’ की शुरूआत जिस
राज्य से होती है वो इतना भुलक्कड़ साबित हो जाएगा कि वो अपनी बेटी के सम्मान देने
की बात पर बचता रहे। क्या कौशल विकास की बात करने वाली हरियाणा की सरकार सोना से
कोई कुशलता नहीं जानेगी? क्या
खिलाड़ियों को सम्मान देने की बात पर भी सरकार की कान पर जूं तक नहीं रेंगेगी? लिहाजा कई सवाल
इसे लेकर खुद ब खुद सिर्फ इसलिए खड़े होते हैं कि सरकारों की कथनी और करनी के
समाधान जिन संभावित स्थानों पर होते हैं;
सरकारें अक्सर वहां से बचकर निकलने का प्रयास करती है। लेकिन क्या इस संबंध में
हमे कचोटने वाले हजारों सवालों को ढक देना उचित है?
खेल मंत्रालय हो या सरकारें चाहे पल्ला झाड़ने या कन्नी काटने के लिए किसी तरह के
आश्वासन या सुझाव दें लेकिन बात सिर्फ एक खिलाड़ी या एक खेल की नहीं बल्कि पूरी
व्यवस्था की है, जिसको साफ करने
की जिम्मेदारी मंत्रालय, सरकार और खेल संघों पर ज्यादा है।

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