''बूढे के मुख से कोई ऐतिहासिक सच्चाई अंगड़ाई ले रही हो जैसे। मेरे अचेतन में चेतना के पैरों की आहट कुछ तेज हुई, पल-भर में मनोज-बबली जैसे कई किस्से बिजली की तरह मेरी आंखों के आगे से कौंध गए।''
अधुरी कहानी एस. एस. पंवार
वक्त के पैरों ने, न जाने कब अपना रास्ता बदला और जिंदगी के सफर में
एक अनजान सख्स को पनाह दे दी।
अनजान तो उसे नहीं कह सकता लेकिन अभी अनजान ही कहूंगा क्योंकि उसे
जानते हुए भी नहीं जानता मैं, और जानता बहुत हूं।
. . . . ये उन दिनों की हवा है जब मैं कॉलेज में
नया-नया गया ही था गांव से। दिन खामोशी लिए उदय होते, ढल जाते। उन शुरूआती दिनों
कॉलेज में आना-जाना काफी सुकूं देता था मुझे। आने जाने के लिए जब भी गाड़ी में
बैठता तो अक्सर सोचा करता था के जिंदगी के सफर में ऐसे छोटे-छोटे न जाने कितने सफर
होते हैं, और उन सफरों में भी छोटे-छोटे और सफर निकल आतें हैं। आज जब घर के लिए रेलगाङी
में बैठकर घर लौट रहा था तो कुछ ऐसा ही सोच रहा था मैं, कि अनायास ही मेरी नजर एक
जगह टिक गई।
एक लङकी। कच्चे रेशम-सी। अभी वो बालिग नहीं। लेकिन बालिग ही हो जैसे। सुंदर तो थी ही, लेकिन उस सुंदरता का वर्णन करना शायद ज्यादा पागलपन
हो मेरा। वर्णन करना उसकी सुंदरता को कम करना मात्र है। शायद ही कोई कालिदास उसे
लिख पाए। उसे सिर्फ महसूस किया जा सकता था। वो मेरे सामने की सीट पर ही थी। जिस
दिशा में गाङी चल रही थी उस तरफ पीठ थी मेरी। अत: सामने की हवा उसके बालों को उङा रही थी, जो बार-बार उसके माथे पर गिर रहे
थे। उन छोटे बालों का बिना हवा के भी यूं गिरना स्वभाविक था मगर आज लग रहा था जैसे
हवा उनसे कोई पुरानी रंजिश निकाल रही हो ।
बचपन में मैं ऐसे सफर के दौरान अक्सर मैं गाङी की खिङकी से बाहर पीछे
छूटते वृक्षों और खेतों को देखा करता था लेकिन आज अंदर ही देख रहा था, लेकिन वो
लड़की अब भी थोङी- थोङी देर के लिए बाहर वृक्ष देख लेती। उसे यूं देखते देखकर मुझे
लगा जैसे मेरे सारे वृक्ष और खेत पीछे छुट गए हों, अब मैं शायद बाहर देखूंगा तो भी मुझे कोई वृक्ष
दिखाई नहीं देगा।
नजरें क्या टिकी..... बस टिकी ही रह गई।
और उन झील सी आंखों में मुझे वो समुन्द्र दिखाई दिया जिसकी कल्पना
आजतक इन आंखों से परे थी। आंखों ने अपना काम किया और बाकि फाइलें मस्तिष्क के पास
भेज दी और यहां तो आंखों का मस्तिष्क के साथ ऐसा रिश्ता था कि इन नयनों के
प्रस्ताव को उसने कभी ठुकराया नहीं।
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वर्षों ध्यान के लिए बैठने पर भी जो ध्यान न लगा वो आज अनायास ही लग
गया। अचानक जैसे आसपास की चीजें खो गई और केवल वही चेहरा दिखाई देता रहा। साधारण
से सफर में जाने कैसी घटना थी कि सबकुछ मेरे बिना किए स्वत: ही चलता रहा। शायद रजनीश के शब्दों को आज हकीकती
जमीन मिल गई, ऐसा सोच रहा था मैं उस वक्त ।
उसको देखते ही लगा जैसे वर्षों से जानतें हैं हम एक-दूसरे को। पता
नही क्या हो गया था मुझे, एक आनंन्द ने मुझे घेर लिया, जैसे दूर कहीं जंगल में
अकेला बैठा हूं मैं, या कोई झरना फूट पड़ा है मेरे आसपास।
इसे क्या नाम दूं ? इस
असमंजस में डूबा हुआ था मैं, जैसे किसी बच्चे से कोई नया खिलौना दिखाकर उसका नाम
पूछ लिया गया हो।
बाकि लोगों की तरह इसे प्यार कहूं या.............
चलो कह देता हूं मैं भी, क्योंकि ऐसे आनंन्द को इसी शब्द से नवाजा है
अब तक दुनियां नें। अमृता की तरह जंगली बूटी तो मैं भी नही खिला सकता।
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अशाब्दिक अभिव्यक्तियां दोनों तरफ सक्रीय थीं। थोड़ी सी देर में काफी
कुछ सोच लिया था मैंने उस वक्त, मेरे और
उसके बारे में। ठान ली थी कि इसी के साथ जिंदगी गुजार देंगे अब तो.....
स्टेशनों पर बार बार रूकती रेलगाड़ी मेरी धड़कनें तेज कर रही थी।
गाड़ी ने एक लम्बा हॉर्न दिया। शायद अब वो
घड़ी आ ही गई थी जिसका मुझे डर था। इस बार के स्टेशन पर गाड़ी रूकने के लिए धीरे
हुई और मेरी धड़कने तेज। लड़की ने हवा से कानों और चेहरे पर बिखरे बालों को ठीक
किया, जो गाड़ी की धीमी रफ्तार के कारण इस बार दोबारा नहीं बिखरे। वो मेरी तरफ
देखती हुई, आंखों में कुछ नमीं सी लिए धीरे सी खड़ी हुई, अपना थैला उठाया और उतरने
के लिए एक औरत के पीछे-पीछे चल दी । मैं भी उसमें डूबा-हुआ-सा खड़ा हो गया। कुछ
कदम बढाए मैंने उसके पीछे...
......लेकिन जिस बारी से मैं उतरने ही वाला था, उसी बारी
से चढते हुए मुझे पापा दिखाई दिए। पापा को देखकर मेरे कदम रूक से गए। पापा ने मुझे
देख लिया और मैं एकदम अनदेखा भाव बनाकर गले और कान के पास खुजली करते हुए चेहरे पर
वास्तविक खुजली के भाव बनाकर गर्दन दूसरी तरफ मोड़ते हुए पास की ही खाली सीट पर
बैठ गया।
. . . . . वो भी शायद न उतरती, गर उसकी मजबूरी न होती। आखिर उसकी मजबूरी
ने उतार दिया उसे और मेरी मजबूरी ने मुझे बैठाए रखा।
और मुझे ही नहीं इस समाज में
अनेकों युवाओं को ऐसी मजबूरियां वर्षों बैठाए रखती हैं।
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. . . बस एक मिलन ही था शायद..... और फिर वक्त ने अपना इतिहास
दोहराया और मिलन की लम्बी घड़ियां परोस दी
मुझे।
ताउम्र उसका साथ निभाने की सोचकर मैं
वर्षों इंतजार करता रहा कि वो राही मुझे फिर मिलेगा मगर वक्त के लम्बे हाथों का
अंदाजा मैं ना लगा पाया। इस इन्तजार में मेरे दिल नें प्यार की इन्हीं पंक्तियों
को समर्थंन दिया . . . .. .
प्यार वो नहीं जिसमें जीत
और हार हो
प्यार कोई चीज नही जो हर
वक्त तैयार हो
प्यार तो वो है जिसमें किसी
के आने की उम्मीद न हो
लेकिन फिर भी इंतजार हो . .
. . . .
. . . . . . . बस ये इंतजार बना रहा।
मैं जहां भी जाता, एक साये की तरह वो चेहरा मेरे साथ चलता। हर राह, मंदिर, मस्जिद,
गुरूद्वारों और मैलों की भीड़ में ये आंखे उसे तलाशती, मगर किसी भी रास्ते पर उस
दिन की तरह आंखे चार नहीं हुई।
दिनों, महिनों और सालों को वक्त के
धागे में मनकों की तरह पिरोता गया मैं, मगर धागे की लंबाई की सीमा का अंदाजा न था
मुझे।
कल्पना के चांद की तरह वो चेहरा
वर्षों मेरे साथ चला।
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आज देर रात उसी की याद में कलम घिस
रहा था। अचानक आंख लग गई। और एक विचित्र
स्वपन ने मुझे घेर लिया। जिसमें मैं उसे खोजता हुआ दर दर भटक रहा था और उसे आवाज
दे रहा था। अंत में मैंने देखा कि मैं पहाड़ों पर उसे खोजने निकल पड़ा हूं और उसकी
बाईं बाजू पर लिखा वो नाम पुकार रहा हूं जो मिलन के वक्त मैंने देखा था। लेकिन मुझे
लग रहा था जैसे कि मेरी आवाज उन बेजान पत्थरों से टकराती हुई वापस मुझे ही सुनाई
पड़ रही है।
अंत में मैने एक भयंकर दृश्य देखा कि
एक भयानक आकृति का सफेद मूंछ-दाढी वाला बूढा
विरान पत्थर की गुफा में बैठा घूर रहा है, उसके हाथ बिलकुल जर्जर थे। ये दृश्य वर्षों पुराना प्रतीत हुआ
मुझे।
मैंने उसको प्रणाम किया लेकिन वो
वृद्ध केवल भर मुझे घूरता रहा। मैं सहम गया। उस सुनसान वातावरण और उसकी डरावनी
शक्ल ने मेरे शरीर में एक कंपन पैदा कर दी। मेरी घबराहट कुछ और बढ गई।
अचानक भागने के लिए मैं पीछे मुड़ा।
मैंने देखा कि एक अत्यंत गहरी झील मेरे पांवों के करीब बन गई है।
मैं खड़ा रहा रहा और धक्के से
लम्बे-लम्बे सांस लेकर हिम्मत बांधने का प्रयास करने लगा।
अचानक उसके होंठ कंपकंपाते स्वर में
हिले, “प्रेमिका की तलाश में निकले हो बेटा ?”
“म..म..मगर तुम्हे कैसे पता? ” मेरे मुंह से डर और लड़खड़ाहट के
साथ निकला।
“वो मिल भी गई तो क्या कर लोगे तुम ?”
“बस एक बार मिल जाए मुझे।”
“एक बार मिली थी न, उसी के कारण
तुम्हारा ये हाल है।”
”लेकिन...............”
“वो तुम्हारी जाति-बिरादरी से नही है
बेटा।”
मैं अवाक रह गया सोचने लगा एकदम
प्रेम के साथ ये नया क्या जुड़ गया, जो उस मिलन के लम्बें समय से लेकर पल-भर पहले
तक मेरे चिंतन से बाहर था। मुझे लगा जैसे क ख ग पढने वाले बच्चे से एकदम किसी ने
कोई क्लिष्ठ-सा बड़ा नाम पूछ लिया हो।
कुछ देर सन्नाटा पसरा रहा।
फिर बूढा बोल पड़ा- “बेटा, तुमसे पहले तुम्हारे जैसे इसी
तरह का रिश्ता लिए बहुत आए हैं यहां। लेकिन तुम्हारे समाज के सोए हुए लोगों ने
उन्हे जीने नहीं दिया” बूढे के मुख से कोई ऐतिहासिक
सच्चाई अंगड़ाई ले
रही हो जैसे। मेरे अचेतन में चेतना ने के पैरों की
आहट कुछ तेज हुई, पल-भर में मनोज-बबली जैसे कई किस्से बिजली की तरह मेरी आंखों के
आगे से कौंध गए।
लेकिन इन सबको एक नाटक समझकर मेरे
मुख से निकला......... “फिर भी?”
“फिर ये पीढीयों पुरानी जात-पात की
दिवारें तुम्हें भी जीने नहीं देंगी बेटा। पहले तुम सभी प्रेमी लोग संगठित होकर
इन्हे दूर करो।” और ऐसा कहते हुए बूढे ने जैसे ही
चारों तरफ हाथ फैलाया, एक विशाल दीवार ने उन पहाड़ों के चारों तरफ आकार ले लिया,
शायद चीन की दीवार से भी बड़ी।
मैंने डरते हुए तुरंत उस बुड्ढे की
तरफ देखा और पूछा कि,” तुम्हे कैसे मालूम, तुम
कौन्.......... और जैसे मेरा ये लफ्ज अधुरा ही छुट गया हो....
उसने कहा, “मैं समय हूं।”
इतने में मुझे जैसे कोई करंट का
झटका-सा लगा। मैं चमका और मेरी आंखे खुल गई। आज भी उस स्वपन को सोच रहा
हूं..............
कभी कभी मुझे ये कोरी कल्पना भर जान
पड़ती है, मगर एकांत के दौरान जब अंदर
झांक कर देखता हूं तो वो दिन आज भी हरे हो जाते हैं। अब लगता है शायद यह कोई कहानी
नहीं...
वरन
मेरे जीवन के पौधे पर लगा
एक अधखिला पुष्प है।
जिसे
समय रहते
न तो समाज ने खिलने दिया
और न ही
पर्यावरण ने इसे पोषण दिया।
और ये ऐसा पुष्प
कालान्तर में
शब्दों का सहारा पाकर
एक अधुरी कहानी बन गया।
- साल 2014 में हरियाणा ग्रंथ अकादमी की मासिक पत्रिका कथा-समय के मार्च अंक में प्रकाशित