Sunday, 9 December 2018

जिंदगी: एक हताश डायरी / एस.एस.पंवार

बहुत जल्दी समझदार होने पर हमें उदासी और नीरसता घेर लेती है। सबकुछ जान लेने पर बिना जाने योग्य कुछ नहीं बचता। हमारे पास पारिभाषिक तौर सब चीजों के निदान होते हैं। सबके वैज्ञानिक हल। जिज्ञासाएं खत्म। पहेलियां खत्म। दो और दो चार। बस। ऐसे में जिज्ञासाओं के साथ हमारी आशाएं भी खत्म हो जाती हैं। जिज्ञासाएं कम बचती है और उम्मीद बड़ी। इतनी बड़ी कि एक उम्र छोटी पड़े हासिल होने के लिए।

शायद हमें धीरे-धीरे समझदार होना चाहिए। हमारी जियादा मानसिक उम्रें हमें थका देने लगती है और वापस अशिक्षित होना चाहते हैं हम। लेकिन अशिक्षित होने के शायद कोई रास्ते नहीं। हमें मन्दिर से निकाला तो जा सकता है पर मन्दिर में घुसाया नहीं जा सकता। इस संबन्ध में जब मैंने वामपंथी रहने के उपरांत कुछ बरस बाद साधु हो चुके एक मित्र से पूछा तो उसने कहा कि जिंदगी का मजा छोटी छोटी चीजों में है बुद्दिजीवी होने में नहीं। जैसे बच्चे को खिलौना दे दिया जाए तो वो खुश हो जाता है और पूरी दुनिया उसी खिलौने से जीने लगता है। लेकिन उसे कहें कि तुम्हें प्रधानमंत्री बना दें तो वो खुश नहीं होगा। मुझे ये बात सहमत करती है या नहीं ये बाद का प्रश्न है लेकिन कुछ महिलाओं को जो खूब पढ़ी लिखी, डिग्री धारक होती हैं तो भी उन्हें खेत-खलिहान, रिश्ते-नाते, सास-ससुर, ननद ये सब बातें करते और इंच-इंच मेकअप किये हुए पाया जाता है जो कथित रूप से प्रगतिशील लोगों को शायद अजीब लग सकती हैं। मुझे भी लगती हैं। पर क्या सच में वे मूर्ख होती है; इसके अलग-अलग उत्तर हो सकते हैं।

कुछ लोगों को कहते सुना है कि हमारे आस्तिक और नास्तिक होने से कोई फर्क नहीं पड़ता। तमाम मूर्खताएं छोड़ दी जाएं तो सिंगमन फ्रायड की इस बात पर विश्वास स्वतः हो जाता है कि दुनिया भ्रम के बगैर जी ही नहीं सकती। चाहे हम आस्तिक हों या नास्तिक; हम किसी खाखे में नहीं बंधना चाहते, कुछ अजीब से तर्क हम ये सब होते हुए भी अपने अपने यहां निकाल लाते हैं जिन पर जिंदगी बसर हो जाती है। हम निराशाओं के वक्त अपनी निराशाओं के वास्तविक कारण न जानते हुए शराब, स्मोकिंग (नशा लेकर), सेक्स, कला या संगीत में अपनी हताशा दूर करने के लिए प्रयत्नशील रहते हैं, मगर क्या वाकई उनसे हमें राहत मिलती है ! इसके जवाब भिन्न भिन्न हो सकते हैं। लेकिन हम इनसे लम्बी खुशी नहीं हासिल कर सकते। 'रोग' फ़िल्म के शुरुआत में इरफान इन्हीं लक्षणों का जिक्र करता है। हम शायद प्रकृति से बहुत दूर चले आये हैं, उससे जुड़कर खुशी लौटाई जा सकती है, प्रेम लौटाया जा सकता है। वो प्रेम नहीं जो हम करते हैं, बल्कि वो जो है। हम जिन चीजों को पाने के लिए मर रहे हैं उसे पाकर भी हम खुश नहीं है। बर्नार्ड शॉ ने लिखा है कि दुनिया सिर्फ दो ही कारणों से दुखी हैं, एक तो जिस चीज को हम पाना चाहते हैं वो हमें मिल जाएं। और एक हम जिस चीज को हम पाना चाहते हैं वो हमें न मिले। यही दो दुख हैं शायद दुनियां में।

Saturday, 11 November 2017

स्मृति


माजरा से लौटे अभी सप्ताह-भऱ बीता है। उन्नीस में ऐसा कुछ भी नहीं जो उन हवाओं में था।
यहां की मिट्टी में उस नगर-सी खुशबू नहीं। यहां की गलियों में वैसे चौबारे भी नहीं। और न ही इस वातावरण में उतनी नमीं। पहाङियों से कुछ ही दूरी पर बसा वह टाऊन लगभग हर रोज बारिश से भीग जाता था। चौथी मंजिल यानि कमरे की छत से जब मैं उत्तर की ओर निगाहें फैलाता था तो कोहरे से लिपटी पहाङियां अक्सर मेरे दिल को सुकूं से भर देतीं।

वो मिले-जुले से लोग। वो गुरुद्वारा, वो मंदिर.... और वो मस्जिद भी अब जैसे पुराने शहर की-सी यादें हो गईं हैं। मगर कभी-कभी ये लगता नहीं है कि उस बस्ती को छोङ आया हूं मैं। यूं महसूस होता है जैसे दो जगह जी रहा हूं।

यहां की गलियों में भी काफी बच्चे गुजरतें हैं सुबह-सुबह। मगर वो दलित परिवारों से नहीं । कुछ हाथों में किताब लिए, कुछ पीठ पर बङा-सा थैला लटकाए बच्चे। जो शायद स्कूल जा रहे होतें हैं। उनमें कुछ कालू, कुछ राजू और कुछ गुलाल लगते हैं मुझे , जो माजरा की मंदिर वाली गली के पास की झुग्गी-झोंपङीयों से निकलते थे इस वक्त। यहां की हर बूढी औरत में अब वो दादी नजर आती है जो सुबह-सुबह शहर के उठने से पहले उठकर पास वाले मंदिर चली आती थी।


जाने क्यों मैंने वो टाऊन छोङ दिया जिसकी स्मृतियां अब भी मेरे जेहन में सांसो की तरह ताजा है।
यहां की साफ गलियों को देखकर भी लगता है जैसे अभी-अभी कोई गाय लिफाफा खा गई। और शाम को पांच बजे हर रोज की तरह जैसे वो फटे कपङों वाली औरत कमर पर एक कट्टा-सा लटकाए मेरे माजरा वाले दरवाजे पर आज भी थोङा रुक-कर फिर आगे बढी होगी। और सामने वाली पिंकी आज भी कुछ टूटी हुई-सी तमन्नाएं लेकर जब छत पर आई होगी तो उसे सामने बालकनी में कोई नहीं दिखाई दिया होगा। और इसी तरह रोज सामने वाला सूना चौबारा देखकर बेचारी रो देती होगी वो। बचपन में मां के चले जाने के बाद अब उसकी इस उम्र के असमंजस भरे हालात कौन समझता होगा। पापा अब भी उसे बात-बात पर डांटते-फटकारते होंगे। और पास के घर वाली शालू अब भी स्कूल जाते वक्त पापा से पैसे मांगती होगी।

.....और रक्षाबंधन के पहले दिन पकौङे वाले हामिद के खोखे के पास जिस कुतिया ने तीन बच्चों को जन्म दिया था, वो शायद अब सङक के किनारे तक आने लग गए होंगे।

आज सुबह जब मैं उठा, तो लगा कि उस बैंक के पास लगते ढाबे वाले बिहारी रामू पासमान ने जो मेरे लिए चाय बनाई थी अभी-अभी, वो काफी ठंडी हो गई....

एस. एस. पंवार,  8 सितंबर 2013 / चंडीगढ की यादों से

Wednesday, 18 May 2016

‘आयाराम’ या ‘घर वापसी’


दाग धुल ही गए होंगे अब तो हादसों के / यूं तेरा लौट आना अब जन्नत-सा लगने लगा 


                                                            -  एस.एस.पंवार 

कहते हैं रात जब गुजर जाती है तो बात भी चली जाती है। अब तो मगर कई रातें बीत चुकी, कई साल बीत गए, बात पूरी तरह चली गई होगी। लेकिन जो बातें लिखी गईं, छपी, अखबारों की सुर्खियां बनीं, गली चौराहों पर चर्चाओं का हिस्सा बनीं, कैमरों में कैद हुईं, देर तलक देखी और परखी गई; वो इतनी आसानी से चली जाए, शायद इतना आसां नहीं। लेकिन हरियाणा के हजकां सुप्रीमों के कारनामों, मुलाकातों जजबातों से तो ठीक ऐसा ही जान पड़ता है कि बात पूरी तरह चली गई होगी। दरअसल राहुल और सोनियां गांधी के मुलाकाती सिलसिले के बाद हरियाणा  के  भूतपूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय चौधरी भजनलाल के बेटे कुलदीप बिश्नोई ने वापस कांग्रेस में आने का जो मन बनाया था, वो आगे भी बढता दिखा। इतना ही नहीं उन्होनें अपने इस फैसले को लेकर ये भी कहा था कि कांग्रेस में आना उनके लिए घर वापसी जैसा है। और ये सब ज्यादा देर से नहीं वीरवार को ही 10 जनपद दिल्ली में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और उपाध्यक्ष राहुल गांधी की मौजूदगी में उन्होनें पार्टी का दामन थाम लिया।

निश्चित तौर पर ये मान लिया जाएगा कि उनका कांग्रेस में जाना घर वापसी जैसा है, घर वापसी शब्द जो बीजेपी से जुड़कर विवादों में रह चुका है शायद अब कुलदीप के साथ जुड़कर उनकी वापसी की शर्म को कम कर रहा है, तस्वीर में ऐसा कौनसा बड़ा चेहरा बच गया होगा जिसके साथ वो नहीं दिख रहे, शायद शुरूआत में खुद ये शब्द प्रयोग करके ही उन्होनें मीडिया में इस शब्द को फैला दिया होगा नहीं तो आयाराम गयाराम जैसे और भी प्रचलित शब्द उनके परिवार के साथ जुड़े हुए हैं; शायद कुलदीप ने अपने अतीत का अच्छे से मूल्यांकन कर लिया होगा और बाद इसे घर वापसी कहा होगा। इस वापसी के कई तरह के मायने निकाले जा रहे हैं, एक ओर जहां भावी हरियाणा के गैर जाट सीएम के रूप में ये खुद को देख रहे हैं तो वहीं हरियाणा जनहित का वजूद पूरी तरह से खत्म हो जाने की वापसी भी इसे कहा जा सकता है।

मुख्यतौर पर यही चर्चाएं आम है कि बीजेपी के कामकाज को लेकर जनता की विमुखता के साथ-साथ जाट आंदोलन में कांग्रेस के हुड्डा या उनके सलाहकार की संदिग्ध भूमिका जो मानी जाती है, उसके बाद शायद एक मौके के रूप में भी बिश्नोई भी खुद को कांग्रेस में जीना चाहते हों। हालांकि सोशल साईट्स पर जो कांग्रेस को लेकर मुहब्बत उन्होनें बरसाई थी, उसे भी काबिले-तारीफ कहा जाएगा। क्योंकि आज वो तमाम अखबारी सुर्खियां पुरानी नहीं जिनमें वो कभी कांग्रेस अध्यक्ष सोनियां गांधी को गाली देते नहीं थकते थे तो कभी राहुल को फ्लोप  पीएम के रूप में उनका भविष्य देखते थे। कांग्रेस के कुछ विरोधियों द्वारा ये भी कहा जा रहा है कि कुलदीप हमेशा से कांग्रेस के ही थे और आपसी मनमुटाव के चलते ये पार्टी से दूर हुए, जिसके दूर होने के बाद अब ये 9 वर्ष बाद वापस लौट आए हैं।

सीधे तौर पर देखा जाए तो हरियाणा जनहित कांग्रेस का कोई खास वजूद रह नहीं गया था। लोकसभा में इस पार्टी की कोई सीट नहीं है, जबकि‍ 90 विधायकों वाली विधानसभा में पार्टी के सिर्फ दो एमएलए हैं। वहीं बीजेपी के साथ इन्होनें गत लोकसभा में जिन दो सीटों हिसार और सिरसा ( जिसे इनका क्षेत्र माना जाता है) से जो चुनाव लड़ा, वो दोनों सीटें हार जाना इनके लिए चिंताजनक था। ऐसे में लोकसभा की शर्मनाक हार के बाद शायद 2014 से ही पार्टी की दशा सोचने लायक थी। दिल्ली से जुड़े कांग्रेस सूत्रों के अनुसार हरियाणा के अलावा केंद्र में बैठे कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता पिछले लंबे समय से कुलदीप के साथ संपर्क साधे हुए थे। साथ ही, संगठन के कई ऐसे नेता भी हैं, जो कुलदीप का कांग्रेस में आने का विरोध कर रहे हैं। बताते हैं कि बिश्नोई से बातचीत के बाद सोनिया और राहुल गांधी इस बारे में हरियाणा के कांग्रेस मामलों के प्रभारी डॉ. शकील अहमद से भी रिपोर्ट ले चुके हैं।

बेशक, प्रदेश कांग्रेस के अधिकांश वरिष्ठ नेता कुलदीप की कांग्रेस में वापसी पर चुप्पी साधे हुए हैं, लेकिन वे इससे पूरी तरह इनकार भी नहीं कर रहे हैं। वहीं मोटे तौर पर विपक्ष के द्वारा ये भी माना जा रहा है कि हरियाणा की कांग्रेस खेमों में बंटी हुई है और कुलदीप बिश्नोई के आने से एक खेमें के बढने के सिवा कुछ नहीं होने वाला। निश्चित तौर पर ये बात जगजाहिर है कि हरियाणा की कांग्रेस में पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा, कांग्रेस विधायक दल की नेता किरण चौधरी, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष डॉ. अशोक तंवर, कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला और कैप्टन अजय सिंह यादव को गुटों में बांटकर अक्सर देखा जाता रहा है। हरियाणा की सत्तारूढ पार्टी के अध्यक्ष ने तो इस विलय को महज एक खेमें में वृद्धि होना ही बताया है।

अगर देखा जाए तो भूतपूर्व सीएम भजन लाल के छोटे बेटे कुलदीप अपने पीछे हरियाणा की चौधर का इतिहास लपेटे हुए हैं। एक मजबूत वर्चस्व इनके परिवार का सन 2005 में ही देख लिया गया था जब विधानसभा चुनाव चौ. भजनलाल के नेतृत्व में लड़ा गया था और कांग्रेस ने 67 सीटों के साथ पूर्ण बहुमत हासिल किया था। लेकिन अधिकतर हरियाणावासियों की उम्मीदों के खिलाफ चौ. भजनलाल के बजाय चौ. भूपेंद्र सिंह हुड्डा को पार्टी विधायक दल का नेता बनाकर राज्य की कमान सौंप दी गई थी। इसके बाद से भजनलाल कांग्रेस से खफा थे। 2 दिसंबर, 2007 में बड़ी रैली करके भजनलाल व उनके बेटे कुलदीप बिश्नोई ने कांग्रेस छोड़ने का ऐलान किया और इसी दिन हजकां ( हरियाणा जनहित कांग्रेस, बीएल) का गठन भी किया। पार्टी गठन के बाद कुलदीप बिश्नोई 2 बार लोकसभा और 2 बार ही विधानसभा के चुनावों में पार्टी के उम्मीदवार उतार चुके हैं।

2009 के लोकसभा चुनावों में हिसार लोकसभा क्षेत्र से भजनलाल ने हजकां टिकट पर जीत हासिल की थी। इसी वर्ष हुए विधानसभा चुनावों में कुलदीप बिश्नोई सहित हजकां के 6 विधायक चुने गये। हालांकि बाद में 5 विधायक कांग्रेस में चले गये थे। 2014 का लोकसभा चुनाव कुलदीप ने भाजपा के साथ गठबंधन करके लड़ा। हजकां ने 2 सीटों पर चुनाव लड़ा और दोनों पर ही उसके उम्मीदवारों की हार हुई। विधानसभा चुनाव में भाजपा से गठबंधन टूट गया तो हजकां ने अपने बूते ही चुनाव लड़ा। आदमपुर से कुलदीप बिश्नोई खुद और हांसी से उनकी पत्नी रेणुका बिश्नोई ही जीत हासिल कर सकीं। इस तरह से धीरे-धीरे इनका पार्टी प्रभाव कम होता गया और स्थिति आज तक पहुंच गई।

खैर जो भी हुआ, जैसे भी हुआ, घर वापसी तो हो ही गई, अब देखना होगा कि घर में प्यार-प्रेम भी बना रहता है या मौजूदा रहनसहन की तरह बनी अलग-अलग कैबिनों की तरह नए मेहमान सदस्य को भी एक और कमरा सौंप दिया जाएगा। बीजेपी के चाहे छोटे से लेकर बड़े कार्यकर्ताओं तक जो भी बयानबाजियां आती रही हों; बोलने की जरूरत शायद वहीं पैदा होती जहां कुछ न कुछ डर पैदा हो रहा हो या किसी न किसी तरह दूसरा पलड़ा भारी होता नजर आ रहा हो। लोकतंत्र में हालात चाहे कैसे भी पैदा हो जाएं लेकिन स्थानीय या प्रादेशिक जनता मुख्य गिनी-चुनी पार्टियों को अक्सर आजमाती रहती है। आगामी विधानसभा के लिए कांग्रेस या इनेलों चाहे कितनी भी मजबूत या कमजोर रही हो, या है, लेकिन इस वापसी ने सत्तारूढ बीजेपी को फिर से जीत हासिल करने के लिए एक संघर्ष की स्थिति तो पैदा कर ही दी है।  


...ताकि ‘गेम’ बनकर न रह जाए ‘गेम’

शोहरत की बुलंदी पे ताली ना बजा / ख़लिश-सी निगाहों में तलाश कोई सपना...

                                                  ·        एस.एस.पंवार

खेलों से हम स्वस्थ रहने की बात करते हैं, खेलों से हम संस्कृति, तहजीब की बात करते हैं, खेलों से हम आगे बढने की बात करते हैं। खेल हमारे इतिहास और संस्कृति का हिस्सा होते हैं। खेल मान मर्यादा, स्वाभिमान, जोश, उमंग और देश के प्रति भक्तिभावना और समर्पण का पाठ पढाते हैं। अपने बच्चे को खेलता देखकर कौन मां-बाप प्रफुल्लित न होता होगा। कौन मां बाप ऐसा होगा जो न चाहे कि उसके बच्चे विदेशों में खेलकर देश और परिवार का नाम रोशन करें। जब भी विदेश या बड़ी खेल प्रतियोगिताओं से कोई खिलाड़ी तमगा या मेडल जीतकर लौटता है तो हमारे घरों, पड़ोस और गांव में जिन ढोल-नगाड़ों और फूलमालाओं के साथ जो स्वागत होता है वो तो आपने देखा ही होगा, और ये भी देखा होगा उसी भावुकता में हम गर्व से अपनी जीत का सेहरा मां-बाप के सर बांध देते हैं,  और बांध देना लाजिम सी बात है। लेकिन मां-बाप द्वारा दी गई एक छोटी सी आजादी के बाद वास्तव में हम जो परेशानियां, पीड़ाएं, समझौते, मजबूरियां या बेबसी सहते हैं; क्या ठीक उसी वक्त हमने उसका मूल्यांकन या विश्लेषण करके देखा है कभी? शायद नहीं। मगर भारतीय महिला फुटबाल की पूर्व कप्तान बबीता / सोना चौधरी की हाल ही में आई किताब गेम इन गेम खासकर महिला खिलाड़ियों के कैरियर में आने वाली इन्हीं समस्याओं को रेखांकित करती है।


उनकी किताब के मुताबिक उन्होनें महिलाओं के खेल क्षेत्र में आने वाली हर समस्या को उजागर करने का प्रयास किया है, अपनी किताब में उन्होनें 90 फैक्ट और 10 प्रतिशत फिक्शन शामिल किया है। ये किताब उन दुखदायी अनुभवों पर आधारित है जो उन्होनें आसपास के वातावरण में देखा और खुद अपने समय में बहुत करीब से महसूस किया। मैनेजमेंट को लेकर फुटबॉल टीम के कोच और सेक्रेटरी महिला खिलाडियों के शोषण की बात का जिक्र भी उनकी किताब में आता है। उन्होनें कहा कि जिन कमरों में खिला‍ड़ी रुकती थीं उन्ही कमरों में कोच और सेक्रेटरी भी रूकते थे। बहरहाल, सोना चौधरी की इस सच्चाई से पूरा मीडिया जगत तो वाकिफ है ही वहीं चर्चाएं अब आम जन और गली मोहल्लों तक भी पहुंच गई है। विदित हो कि 1976 में हरियाणा के ही रोहतक जिले में जन्मी सोना चौधरी ने 1989 से अपने कैरियर की शुरूआत की थी, इसी बीच 1998 में एशियन गेम्स से ठीक पहले चोटिल होने के बाद सोना चौधरी को खेल का मैदान छोड़ना पड़ा। अपने इस कैरियर में हरियाणा ही नहीं बल्कि उत्तर प्रदेश और भारतीय महिला फुटबाल की टीम की कैप्टन भी रह चुकी सोना फिलहाल लेखन, इमेज मैनेजमेंट एवं जेंडर ट्रैनिंग फील्ड में एक्टिव है, आपको बता दें कि वे अमेरिका से इमेज मैनेजमेंट और सिंगापुर से लीडरशिप डवलपमेंट की भी पढाई कर चुकी हैं।
खैर जीवन परिचय से कहीं गहरा सवाल ये है कि आखिर क्यों महिलाओं को खेल जगत में क्यों शोषण की दहलीज पार करनी पड़ती है। पिछले दिनों पाकिस्तान से आई एक खबर के मुताबिक वहां 5 महिला क्रिकेट खिलाड़ियों ने मुल्‍तान क्रिकेट क्‍लब (MCC) के अधिकारियों पर यौन शोषण का आरोप लगाते हुए कहा था कि क्‍लब के अधिकारी नेशनल टीम में सलेक्‍शन करने के बदले 'सेक्‍शुअल फेवर' मांगते हैं। इतना ही नहीं खबरें और भी कई इस तरह की आती रही हैं, छोटे ग्रामीण स्तर से लेकर राष्ट्रीय और अन्तराष्ट्रीय स्तर तक ये गंदा खेल देखा जाता रहा है। विश्लेषणात्मक तौर पर देखें तो खेल की गंदगी यहीं नहीं ठहर जाती; खिलाड़ियों के लिए मेडिकल सुविधाओं, यात्रा भत्तों, रहने के लिए, रूकने के लिए महफूज स्थानों और उनकी खुराक इत्यादि को लेकर हर तरह की सुविधाओं पर सरकार को जागने की जरूरत है। खिलाड़ियों की अनदेखी का अंदाजा तो खुद इस खबर से ही लगाया जा सकता है कि कभी हरियाणा और भारत की कैप्टन के तौर पर खेलने वाली सोना को आज हरियाणा पूरी तरह से भूला हुआ है, हालांकि कौशल, विकास, खेल और हर क्षेत्र में अपने अनुभव के बाद साहित्य के मोती पिरोने वाली सोना अपनी प्रसिद्धियों को लेकर आज भी हरियाणा की आने वाली पौध के लिए सजग प्रहरी के तौर पर एक अच्छा चेहरा हो सकती हैं। एक बातचीत में उन्होनें बताया की हरियाणा के बच्चों में खेल क्षेत्र को लेकर अच्छी संभावनाएं है बशर्ते कि उन्हे नियमित मार्गदर्शन, माहौल और अच्छी जमीन मिलती रहे।

हरियाणा के कुछ बाह्य सूत्रों की माने तो हिमाचल प्रदेश द्वारा सोना चौधरी को गोद ले लिए जाने की खबरें भी सुगबुगाहटों में हैं। ऐसे में ये सवाल उठता है कि क्या हरियाणा अपनी बेटी को पूरी तरह से भुला देगा? क्या बेटी बचाने और बेटी पढाने की शुरूआत जिस राज्य से होती है वो इतना भुलक्कड़ साबित हो जाएगा कि वो अपनी बेटी के सम्मान देने की बात पर बचता रहे। क्या कौशल विकास की बात करने वाली हरियाणा की सरकार सोना से कोई कुशलता नहीं जानेगी? क्या खिलाड़ियों को सम्मान देने की बात पर भी सरकार की कान पर जूं तक नहीं रेंगेगी?  लिहाजा कई सवाल इसे लेकर खुद ब खुद सिर्फ इसलिए खड़े होते हैं कि सरकारों की कथनी और करनी के समाधान जिन संभावित स्थानों पर होते हैं; सरकारें अक्सर वहां से बचकर निकलने का प्रयास करती है। लेकिन क्या इस संबंध में हमे कचोटने वाले हजारों सवालों को ढक देना उचित है? खेल मंत्रालय हो या सरकारें चाहे पल्ला झाड़ने या कन्नी काटने के लिए किसी तरह के आश्वासन या सुझाव दें लेकिन बात सिर्फ एक खिलाड़ी या एक खेल की नहीं बल्कि पूरी व्यवस्था की है, जिसको साफ करने की जिम्मेदारी मंत्रालय, सरकार और खेल संघों पर ज्यादा है।


Monday, 15 February 2016

कहानियों का अंजुमन

''बूढे के मुख से कोई ऐतिहासिक सच्चाई अंगड़ाई ले रही हो जैसे। मेरे अचेतन में चेतना के पैरों की आहट कुछ तेज हुई, पल-भर में मनोज-बबली जैसे कई किस्से बिजली की तरह मेरी आंखों के आगे से कौंध गए।''


अधुरी कहानी                                                                                                                                                    एस. एस. पंवार                    


वक्त के पैरों ने, न जाने कब अपना रास्ता बदला और जिंदगी के सफर में एक अनजान सख्स को पनाह दे दी।

अनजान तो उसे नहीं कह सकता लेकिन अभी अनजान ही कहूंगा क्योंकि उसे जानते हुए भी नहीं जानता मैं, और जानता बहुत हूं।

. . . . ये उन दिनों की हवा है जब मैं कॉलेज में नया-नया गया ही था गांव से। दिन खामोशी लिए उदय होते, ढल जाते। उन शुरूआती दिनों कॉलेज में आना-जाना काफी सुकूं देता था मुझे। आने जाने के लिए जब भी गाड़ी में बैठता तो अक्सर सोचा करता था के जिंदगी के सफर में ऐसे छोटे-छोटे न जाने कितने सफर होते हैं, और उन सफरों में भी छोटे-छोटे और सफर निकल आतें हैं। आज जब घर के लिए रेलगाङी में बैठकर घर लौट रहा था तो कुछ ऐसा ही सोच रहा था मैं, कि अनायास ही मेरी नजर एक जगह टिक गई।

एक लङकी। कच्चे रेशम-सी। अभी वो बालिग नहीं। लेकिन बालिग ही हो जैसे। सुंदर तो थी ही, लेकिन उस सुंदरता का वर्णन करना शायद ज्यादा पागलपन हो मेरा। वर्णन करना उसकी सुंदरता को कम करना मात्र है। शायद ही कोई कालिदास उसे लिख पाए। उसे सिर्फ महसूस किया जा सकता था। वो मेरे सामने की सीट पर ही थी। जिस दिशा में गाङी चल रही थी उस तरफ पीठ थी मेरी। अत: सामने की हवा उसके बालों को उङा रही थी, जो बार-बार उसके माथे पर गिर रहे थे। उन छोटे बालों का बिना हवा के भी यूं गिरना स्वभाविक था मगर आज लग रहा था जैसे हवा उनसे कोई पुरानी रंजिश निकाल रही हो ।

बचपन में मैं ऐसे सफर के दौरान अक्सर मैं गाङी की खिङकी से बाहर पीछे छूटते वृक्षों और खेतों को देखा करता था लेकिन आज अंदर ही देख रहा था, लेकिन वो लड़की अब भी थोङी- थोङी देर के लिए बाहर वृक्ष देख लेती। उसे यूं देखते देखकर मुझे लगा जैसे मेरे सारे वृक्ष और खेत पीछे छुट गए हों, अब  मैं शायद बाहर देखूंगा तो भी मुझे कोई वृक्ष दिखाई नहीं देगा।

नजरें क्या टिकी..... बस टिकी ही रह गई।

और उन झील सी आंखों में मुझे वो समुन्द्र दिखाई दिया जिसकी कल्पना आजतक इन आंखों से परे थी। आंखों ने अपना काम किया और बाकि फाइलें मस्तिष्क के पास भेज दी और यहां तो आंखों का मस्तिष्क के साथ ऐसा रिश्ता था कि इन नयनों के प्रस्ताव को उसने कभी ठुकराया नहीं।  

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वर्षों ध्यान के लिए बैठने पर भी जो ध्यान न लगा वो आज अनायास ही लग गया। अचानक जैसे आसपास की चीजें खो गई और केवल वही चेहरा दिखाई देता रहा। साधारण से सफर में जाने कैसी घटना थी कि सबकुछ मेरे बिना किए स्वत: ही चलता रहा। शायद रजनीश के शब्दों को आज हकीकती जमीन मिल  गई, ऐसा सोच रहा था मैं उस वक्त ।

उसको देखते ही लगा जैसे वर्षों से जानतें हैं हम एक-दूसरे को। पता नही क्या हो गया था मुझे, एक आनंन्द ने मुझे घेर लिया, जैसे दूर कहीं जंगल में अकेला बैठा हूं मैं, या कोई झरना फूट पड़ा है मेरे आसपास।

इसे क्या नाम दूं ? इस असमंजस में डूबा हुआ था मैं, जैसे किसी बच्चे से कोई नया खिलौना दिखाकर उसका नाम पूछ लिया गया हो।

बाकि लोगों की तरह इसे प्यार कहूं या.............
चलो कह देता हूं मैं भी, क्योंकि ऐसे आनंन्द को इसी शब्द से नवाजा है अब तक दुनियां नें। अमृता की तरह जंगली बूटी तो मैं भी नही खिला सकता।

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अशाब्दिक अभिव्यक्तियां दोनों तरफ सक्रीय थीं। थोड़ी सी देर में काफी कुछ सोच लिया था मैंने उस वक्त, मेरे और उसके बारे में। ठान ली थी कि इसी के साथ जिंदगी गुजार देंगे अब तो.....
स्टेशनों पर बार बार रूकती रेलगाड़ी मेरी धड़कनें तेज कर रही थी। गाड़ी ने एक लम्बा हॉर्न दिया।  शायद अब वो घड़ी आ ही गई थी जिसका मुझे डर था। इस बार के स्टेशन पर गाड़ी रूकने के लिए धीरे हुई और मेरी धड़कने तेज। लड़की ने हवा से कानों और चेहरे पर बिखरे बालों को ठीक किया, जो गाड़ी की धीमी रफ्तार के कारण इस बार दोबारा नहीं बिखरे। वो मेरी तरफ देखती हुई, आंखों में कुछ नमीं सी लिए धीरे सी खड़ी हुई, अपना थैला उठाया और उतरने के लिए एक औरत के पीछे-पीछे चल दी । मैं भी उसमें डूबा-हुआ-सा खड़ा हो गया। कुछ कदम बढाए मैंने उसके पीछे...

 ......लेकिन जिस बारी से मैं उतरने ही वाला था, उसी बारी से चढते हुए मुझे पापा दिखाई दिए। पापा को देखकर मेरे कदम रूक से गए। पापा ने मुझे देख लिया और मैं एकदम अनदेखा भाव बनाकर गले और कान के पास खुजली करते हुए चेहरे पर वास्तविक खुजली के भाव बनाकर गर्दन दूसरी तरफ मोड़ते हुए पास की ही खाली सीट पर बैठ गया।

. . . . . वो भी शायद न उतरती, गर उसकी मजबूरी न होती। आखिर उसकी मजबूरी ने उतार दिया उसे और मेरी मजबूरी ने मुझे बैठाए रखा।

 और मुझे ही नहीं इस समाज में अनेकों युवाओं को ऐसी मजबूरियां वर्षों बैठाए रखती हैं।

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  . . . बस एक मिलन ही था शायद..... और फिर वक्त ने अपना इतिहास दोहराया और मिलन की लम्बी घड़ियां परोस दी  मुझे।

ताउम्र उसका साथ निभाने की सोचकर मैं वर्षों इंतजार करता रहा कि वो राही मुझे फिर मिलेगा मगर वक्त के लम्बे हाथों का अंदाजा मैं ना लगा पाया। इस इन्तजार में मेरे दिल नें प्यार की इन्हीं पंक्तियों को समर्थंन दिया . . . .. .

                     प्यार वो नहीं जिसमें जीत और हार हो
                     प्यार कोई चीज नही जो हर वक्त तैयार हो
                     प्यार तो वो है जिसमें किसी के आने की उम्मीद न हो
                     लेकिन फिर भी इंतजार हो . . . . . .

. . . . . . . बस ये इंतजार बना रहा। मैं जहां भी जाता, एक साये की तरह वो चेहरा मेरे साथ चलता। हर राह, मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारों और मैलों की भीड़ में ये आंखे उसे तलाशती, मगर किसी भी रास्ते पर उस दिन की तरह आंखे चार नहीं हुई।

दिनों, महिनों और सालों को वक्त के धागे में मनकों की तरह पिरोता गया मैं, मगर धागे की लंबाई की सीमा का अंदाजा न था मुझे।
कल्पना के चांद की तरह वो चेहरा वर्षों मेरे साथ चला।

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आज देर रात उसी की याद में कलम घिस रहा था। अचानक आंख लग गई। और एक विचित्र स्वपन ने मुझे घेर लिया। जिसमें मैं उसे खोजता हुआ दर दर भटक रहा था और उसे आवाज दे रहा था। अंत में मैंने देखा कि मैं पहाड़ों पर उसे खोजने निकल पड़ा हूं और उसकी बाईं बाजू पर लिखा वो नाम पुकार रहा हूं जो मिलन के वक्त मैंने देखा था। लेकिन मुझे लग रहा था जैसे कि मेरी आवाज उन बेजान पत्थरों से टकराती हुई वापस मुझे ही सुनाई पड़ रही है।

अंत में मैने एक भयंकर दृश्य देखा कि एक भयानक आकृति का सफेद मूंछ-दाढी वाला बूढा  विरान पत्थर की गुफा में बैठा घूर रहा है, उसके हाथ बिलकुल जर्जर थे। ये दृश्य वर्षों पुराना प्रतीत हुआ मुझे।

मैंने उसको प्रणाम किया लेकिन वो वृद्ध केवल भर मुझे घूरता रहा। मैं सहम गया। उस सुनसान वातावरण और उसकी डरावनी शक्ल ने मेरे शरीर में एक कंपन पैदा कर दी। मेरी घबराहट कुछ और बढ गई।

अचानक भागने के लिए मैं पीछे मुड़ा। मैंने देखा कि एक अत्यंत गहरी झील मेरे पांवों के करीब बन गई है।

मैं खड़ा रहा रहा और धक्के से लम्बे-लम्बे सांस लेकर हिम्मत बांधने का प्रयास करने लगा।

अचानक उसके होंठ कंपकंपाते स्वर में हिले, प्रेमिका की तलाश में निकले हो बेटा ?”

म..म..मगर तुम्हे कैसे पता? ” मेरे मुंह से डर और लड़खड़ाहट के साथ निकला।

वो मिल भी गई तो क्या कर लोगे तुम ?”

बस एक बार मिल जाए मुझे।

एक बार मिली थी न, उसी के कारण तुम्हारा ये हाल है।

लेकिन...............

वो तुम्हारी जाति-बिरादरी से नही है बेटा।

मैं अवाक रह गया सोचने लगा एकदम प्रेम के साथ ये नया क्या जुड़ गया, जो उस मिलन के लम्बें समय से लेकर पल-भर पहले तक मेरे चिंतन से बाहर था। मुझे लगा जैसे क ख ग पढने वाले बच्चे से एकदम किसी ने कोई क्लिष्ठ-सा बड़ा नाम पूछ लिया हो।

कुछ देर सन्नाटा पसरा रहा।

फिर बूढा बोल पड़ा- बेटा, तुमसे पहले तुम्हारे जैसे इसी तरह का रिश्ता लिए बहुत आए हैं यहां। लेकिन तुम्हारे समाज के सोए हुए लोगों ने उन्हे जीने नहीं दिया बूढे के मुख से कोई ऐतिहासिक
सच्चाई अंगड़ाई ले रही हो जैसे। मेरे अचेतन में चेतना ने के पैरों की आहट कुछ तेज हुई, पल-भर में मनोज-बबली जैसे कई किस्से बिजली की तरह मेरी आंखों के आगे से कौंध गए।

लेकिन इन सबको एक नाटक समझकर मेरे मुख से निकला......... फिर भी?”

फिर ये पीढीयों पुरानी जात-पात की दिवारें तुम्हें भी जीने नहीं देंगी बेटा। पहले तुम सभी प्रेमी लोग संगठित होकर इन्हे दूर करो। और ऐसा कहते हुए बूढे ने जैसे ही चारों तरफ हाथ फैलाया, एक विशाल दीवार ने उन पहाड़ों के चारों तरफ आकार ले लिया, शायद चीन की दीवार से भी बड़ी।

मैंने डरते हुए तुरंत उस बुड्ढे की तरफ देखा और पूछा कि, तुम्हे कैसे मालूम, तुम कौन्.......... और जैसे मेरा ये लफ्ज अधुरा ही छुट गया हो....

उसने कहा, मैं समय हूं।

इतने में मुझे जैसे कोई करंट का झटका-सा लगा। मैं चमका और मेरी आंखे खुल गई। आज भी उस स्वपन को सोच रहा हूं..............

कभी कभी मुझे ये कोरी कल्पना भर जान पड़ती है, मगर एकांत  के दौरान जब अंदर झांक कर देखता हूं तो वो दिन आज भी हरे हो जाते हैं। अब लगता है शायद यह कोई कहानी नहीं...

वरन
मेरे जीवन के पौधे पर लगा
एक अधखिला पुष्प है।
जिसे
समय रहते
न तो समाज ने खिलने दिया
और न ही
पर्यावरण ने इसे पोषण दिया।
और ये ऐसा पुष्प
कालान्तर में
शब्दों का सहारा पाकर

एक अधुरी कहानी बन गया।

                   - साल 2014 में हरियाणा ग्रंथ अकादमी की मासिक पत्रिका कथा-समय के मार्च अंक में प्रकाशित
                                                  


Sunday, 14 February 2016

छुटे प्रेमों का गलियारा...

स्मृति


माजरा से लौटे अभी सप्ताह-भऱ बीता है।

उन्नीस सेक्टर में ऐसा कुछ भी नहीं जो माजरा की गलियों था।

यहां की मिट्टी में उस नगर-सी खुशबू नहीं। यहां की गलियों में वो चौबारे भी नहीं। और न ही इस वातावरण में वहां-सी नमीं...

पहाङियों से कुछ ही दूरी पर बसा वह टाऊन लगभग हर रोज बारिश से भीग जाता था। चौथी मंजिल यानि कमरे की छत से जब मैं उत्तर की ओर जब भी देखता; कोहरे की चादर से लिपटी पहाड़ियां मेरे दिल सुकूं से भर देती थी।

वो मिले-जुले लोग। गुरुद्वारा मंदिर.... और वो मस्जिद भी अब जैसे पुराने शहर की-सी यादें हो चुकी हैं। मगर कभी-कभी ये लगता नहीं कि मैं उस बस्ती को छोङ आया हूं । यूं महसूस होता है जैसे दो जगहों की जिंदगी जी रहा हूं मैं।

यहां की गलियों में भी वहां की तरह काफी बच्चे गुजरतें हैं सुबह-सुबह। मगर वो दलित परिवारों से नहीं। कुछ...हाथों में किताब लिए, तो  कुछ पीठ पर बङा-सा थैला लटकाए बच्चे। जो शायद स्कूल जा रहे होतें हैं। उनमें कुछ कालू, कुछ राजू और कुछ गुलाल लगते हैं मुझे , जो माजरा की मंदिर वाली गली के पास की झुग्गीयों से निकलते थे ठीक इसी वक्त। 

यहां की हर बूढी औरत में अब वो दादी नजर आती है जो सुबह-सुबह शहर के उठने से पहले उठकर पास के मंदिर चली आती थी।

जाने क्यों मैंने वो टाऊन छोङ दिया जिसकी स्मृतियां अब भी मेरे जेहन में सांसो की तरह ताजा है। यहां की साफ गलियों को देखकर भी लगता है जैसे अभी-अभी कोई गाय लिफाफा खा गई.... अभी एक कुत्तों का झुंड यहां से निकल गया। एक भिखारी ने आज फिर मेेरे सामने हाथ फैलाया.... 

और शाम को पांच बजे हर रोज की तरह जैसे वो फटे कपङों वाली औरत कमर पर एक कट्टा-सा लटकाए मेरे माजरा वाले दरवाजे पर थोङा-सा रुक-कर फिर आगे बढी होगी... 

सामने वाली पिंकी आज भी कुछ टूटी हुई-सी तमन्नाएं लेकर जब छत पर आई होगी तो उसे सामने की बालकनी में कोई नहीं दिखा होगा। इसी तरह रोज सामने का सूना चौबारा देखकर बेचारी रो देती होगी वो...

बचपन में मां के चले जाने के बाद अब उसकी इस उम्र के असमंजस भरे हालात कौन समझता होगा। पापा अब भी उसे बात-बात पर डांटते-फटकारते होंगे। और पास के घर वाली शालू अब भी स्कूल जाते वक्त पापा से पैसे मांगती होगी...

.....और रक्षाबंधन के पहले दिन पकौङे वाले हामिद के खोखे के पास जिस कुतिया ने तीन बच्चों को जन्म दिया था, वो शायद अब सङक के किनारे तक आने लग गए होंगे।

....आज सुबह जब मैं उठा, तो लगा कि उस बैंक के पास लगते ढाबे वाले बिहारी रामू पासमान ने जो मेरे लिए चाय बनाई थी अभी-अभी , वो काफी ठंडी हो गई .........

                                                                                                 
                                                                                                                      एस. एस. पंवार

                                                                                                                  डायरी के पन्नों से  

                                                               8 सितंबर, 2013, पंचकूला