बहुत जल्दी समझदार होने पर हमें उदासी और नीरसता घेर लेती है। सबकुछ जान लेने पर बिना जाने योग्य कुछ नहीं बचता। हमारे पास पारिभाषिक तौर सब चीजों के निदान होते हैं। सबके वैज्ञानिक हल। जिज्ञासाएं खत्म। पहेलियां खत्म। दो और दो चार। बस। ऐसे में जिज्ञासाओं के साथ हमारी आशाएं भी खत्म हो जाती हैं। जिज्ञासाएं कम बचती है और उम्मीद बड़ी। इतनी बड़ी कि एक उम्र छोटी पड़े हासिल होने के लिए।
शायद हमें धीरे-धीरे समझदार होना चाहिए। हमारी जियादा मानसिक उम्रें हमें थका देने लगती है और वापस अशिक्षित होना चाहते हैं हम। लेकिन अशिक्षित होने के शायद कोई रास्ते नहीं। हमें मन्दिर से निकाला तो जा सकता है पर मन्दिर में घुसाया नहीं जा सकता। इस संबन्ध में जब मैंने वामपंथी रहने के उपरांत कुछ बरस बाद साधु हो चुके एक मित्र से पूछा तो उसने कहा कि जिंदगी का मजा छोटी छोटी चीजों में है बुद्दिजीवी होने में नहीं। जैसे बच्चे को खिलौना दे दिया जाए तो वो खुश हो जाता है और पूरी दुनिया उसी खिलौने से जीने लगता है। लेकिन उसे कहें कि तुम्हें प्रधानमंत्री बना दें तो वो खुश नहीं होगा। मुझे ये बात सहमत करती है या नहीं ये बाद का प्रश्न है लेकिन कुछ महिलाओं को जो खूब पढ़ी लिखी, डिग्री धारक होती हैं तो भी उन्हें खेत-खलिहान, रिश्ते-नाते, सास-ससुर, ननद ये सब बातें करते और इंच-इंच मेकअप किये हुए पाया जाता है जो कथित रूप से प्रगतिशील लोगों को शायद अजीब लग सकती हैं। मुझे भी लगती हैं। पर क्या सच में वे मूर्ख होती है; इसके अलग-अलग उत्तर हो सकते हैं।
कुछ लोगों को कहते सुना है कि हमारे आस्तिक और नास्तिक होने से कोई फर्क नहीं पड़ता। तमाम मूर्खताएं छोड़ दी जाएं तो सिंगमन फ्रायड की इस बात पर विश्वास स्वतः हो जाता है कि दुनिया भ्रम के बगैर जी ही नहीं सकती। चाहे हम आस्तिक हों या नास्तिक; हम किसी खाखे में नहीं बंधना चाहते, कुछ अजीब से तर्क हम ये सब होते हुए भी अपने अपने यहां निकाल लाते हैं जिन पर जिंदगी बसर हो जाती है। हम निराशाओं के वक्त अपनी निराशाओं के वास्तविक कारण न जानते हुए शराब, स्मोकिंग (नशा लेकर), सेक्स, कला या संगीत में अपनी हताशा दूर करने के लिए प्रयत्नशील रहते हैं, मगर क्या वाकई उनसे हमें राहत मिलती है ! इसके जवाब भिन्न भिन्न हो सकते हैं। लेकिन हम इनसे लम्बी खुशी नहीं हासिल कर सकते। 'रोग' फ़िल्म के शुरुआत में इरफान इन्हीं लक्षणों का जिक्र करता है। हम शायद प्रकृति से बहुत दूर चले आये हैं, उससे जुड़कर खुशी लौटाई जा सकती है, प्रेम लौटाया जा सकता है। वो प्रेम नहीं जो हम करते हैं, बल्कि वो जो है। हम जिन चीजों को पाने के लिए मर रहे हैं उसे पाकर भी हम खुश नहीं है। बर्नार्ड शॉ ने लिखा है कि दुनिया सिर्फ दो ही कारणों से दुखी हैं, एक तो जिस चीज को हम पाना चाहते हैं वो हमें मिल जाएं। और एक हम जिस चीज को हम पाना चाहते हैं वो हमें न मिले। यही दो दुख हैं शायद दुनियां में।