Sunday, 14 February 2016

तुम्हारे प्रेमपत्रों से...

प्रिय............


कई दफे तुम्हारे शहर से गुजरना होता है। उजालों, अंधेरों, पो-फटते या साँझ के वक्त। वक्त की जाने वो कौन सी घड़ी होती है, जब ट्रेन तुम्हारे शहर से गुजरती है। तुम्हारे अपने शहर से। मगर जब भी यहां हवाओं से मेरा सामना होता है या ट्रेन ठहरती है यहां, तो सहम-सा जाता हूँसिहर जाता हूँ बेचारी सी आँखें स्टेशन की बेजान कुर्सियां देख रो पड़ती हैं। सोचता हूँ ट्रेन के साथ मैं भी रुक जाऊं, और कुछ पल फिर से बैठ जाऊं उन खाली जगहों की बेरंग यादों में, जहां की सोहबत नें मेरे खाली पन्नों में अपना पहला सफ़ा छोड़ा था। कई दफा तो मन करता है रोऊं यहां बैठकर... जार-जार...

बरसात, पीपल, सूखे पत्ते, झड़े हुए पत्ते, तुम्हारे आंसू और हवा की हल्की-सी गांठें आज भी मेरे भीतर एक भूचाल ला देती है।  मुझे याद है कि एक शाम मैंने तुम्हारे स्टेशन से पीपल के पत्ते तोड़ लिए थे। दो पत्ते। उन पत्तों के सिवाय मेरे पास कुछ भी नहीं है तुम्हारा, भौतिक रूप से। ये पत्ते स्मृतियां हैं तुम्हारी। जीवंत लोगों की मृत स्मृतियां...


कई दफा ये तोहफों-से लगने लगते हैं मुझे। सोचता हूं सामने की अलमारी में सजा दूं... और हटा दूं वहां सालों से रखे धातुओं के स्मृति चिह्न, मेडल्स और ट्रॉफियां। फिर सोचता हूं कहीं सफाई के ये बाहर न फेंक दिए जाएं। बस इस ख़याल के बाद इन्हें साथ रखने लगा हूं, जब भी तुम्हारी याद आती है, इन्हें निकाल लेता हूं। देख लेता हूं। पढ लेता हूं इन पर लिखे तुम्हारे शहर की आबोहवा के खूबसूरत हस्ताक्षर।


बड़ा शरमाया था इन्हें तौड़ते वक्त। रात के अंधेरे में तोड़े पीपल के अंग हैं ये। सोए पेड़ के पत्ते तोड़ना यूं तो अच्छा नहीं होता, धर्म और विज्ञान के फलसफ़े भी इजाजत नहीं देते इसके लिए। मगर यादों की सूईयां जब चुभती है तो तुम्हारे शहर की मिट्टी भी देख लेने को जी चाहता है। शायद यही सोचकर अंजाम दिया था मैनें इस कृत्य को...

जब से तुम गई हो। सब बदल-सा गया है। मुहब्बत की बात करना अब मेरे लिए खुद से युद्ध करने-सा है, मगर जानती हो ! लड़ने की ताकत भी प्रेम में ही होती है। प्रेमों के बगैर जिंदगी तबाह है शायद। प्रेम हौसला है जीवन के लिए, प्रेम प्रोत्साहन है। मैं आनंद से जी लेने को प्रेम कहता हूं। तुम्हारा लौट आना शायद ताकत दे सकता है। खिज़ाओं की बदहाली में बागानों की लकड़ियां तक निलाम हो सकती है। जरा सी मुहब्बत बची है, तो लौट आना।  

                                                     
                                                           पत्र के इंतजार में...

                                             तुम्हारा अपना 'चीनी जापानी'

                                                        

2 comments:

  1. सादर आभार सर। आपकी प्रेरणाओं के बाद इंक़लाब भी साथ चलता रहा है। ब्लाग पर स्वागत करता हूं...

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