Sunday, 14 February 2016

छुटे प्रेमों का गलियारा...

स्मृति


माजरा से लौटे अभी सप्ताह-भऱ बीता है।

उन्नीस सेक्टर में ऐसा कुछ भी नहीं जो माजरा की गलियों था।

यहां की मिट्टी में उस नगर-सी खुशबू नहीं। यहां की गलियों में वो चौबारे भी नहीं। और न ही इस वातावरण में वहां-सी नमीं...

पहाङियों से कुछ ही दूरी पर बसा वह टाऊन लगभग हर रोज बारिश से भीग जाता था। चौथी मंजिल यानि कमरे की छत से जब मैं उत्तर की ओर जब भी देखता; कोहरे की चादर से लिपटी पहाड़ियां मेरे दिल सुकूं से भर देती थी।

वो मिले-जुले लोग। गुरुद्वारा मंदिर.... और वो मस्जिद भी अब जैसे पुराने शहर की-सी यादें हो चुकी हैं। मगर कभी-कभी ये लगता नहीं कि मैं उस बस्ती को छोङ आया हूं । यूं महसूस होता है जैसे दो जगहों की जिंदगी जी रहा हूं मैं।

यहां की गलियों में भी वहां की तरह काफी बच्चे गुजरतें हैं सुबह-सुबह। मगर वो दलित परिवारों से नहीं। कुछ...हाथों में किताब लिए, तो  कुछ पीठ पर बङा-सा थैला लटकाए बच्चे। जो शायद स्कूल जा रहे होतें हैं। उनमें कुछ कालू, कुछ राजू और कुछ गुलाल लगते हैं मुझे , जो माजरा की मंदिर वाली गली के पास की झुग्गीयों से निकलते थे ठीक इसी वक्त। 

यहां की हर बूढी औरत में अब वो दादी नजर आती है जो सुबह-सुबह शहर के उठने से पहले उठकर पास के मंदिर चली आती थी।

जाने क्यों मैंने वो टाऊन छोङ दिया जिसकी स्मृतियां अब भी मेरे जेहन में सांसो की तरह ताजा है। यहां की साफ गलियों को देखकर भी लगता है जैसे अभी-अभी कोई गाय लिफाफा खा गई.... अभी एक कुत्तों का झुंड यहां से निकल गया। एक भिखारी ने आज फिर मेेरे सामने हाथ फैलाया.... 

और शाम को पांच बजे हर रोज की तरह जैसे वो फटे कपङों वाली औरत कमर पर एक कट्टा-सा लटकाए मेरे माजरा वाले दरवाजे पर थोङा-सा रुक-कर फिर आगे बढी होगी... 

सामने वाली पिंकी आज भी कुछ टूटी हुई-सी तमन्नाएं लेकर जब छत पर आई होगी तो उसे सामने की बालकनी में कोई नहीं दिखा होगा। इसी तरह रोज सामने का सूना चौबारा देखकर बेचारी रो देती होगी वो...

बचपन में मां के चले जाने के बाद अब उसकी इस उम्र के असमंजस भरे हालात कौन समझता होगा। पापा अब भी उसे बात-बात पर डांटते-फटकारते होंगे। और पास के घर वाली शालू अब भी स्कूल जाते वक्त पापा से पैसे मांगती होगी...

.....और रक्षाबंधन के पहले दिन पकौङे वाले हामिद के खोखे के पास जिस कुतिया ने तीन बच्चों को जन्म दिया था, वो शायद अब सङक के किनारे तक आने लग गए होंगे।

....आज सुबह जब मैं उठा, तो लगा कि उस बैंक के पास लगते ढाबे वाले बिहारी रामू पासमान ने जो मेरे लिए चाय बनाई थी अभी-अभी , वो काफी ठंडी हो गई .........

                                                                                                 
                                                                                                                      एस. एस. पंवार

                                                                                                                  डायरी के पन्नों से  

                                                               8 सितंबर, 2013, पंचकूला

                                                                                                     

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